सरायकेला के हाई तिरुल गांव में पानी का संकट : महिलाएं रोज 2 किमी पैदल चलकर पश्चिम बंगाल से लाती हैं पानी

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  • *सरायकेला खरसावां जिला प्रशासन को कई बार दिया आवेदन पर नहीं मिला हैंडपंप
  • *खेतों के बीच बने गड्ढे से पानी लेकर आती हैं घर की महिलाएं, तब चलता है काम
  • *2019 में बोरिंग की व्यवस्था हुई पर महज 12 महीने बाद ही यह भी दे गया जवाब

सरायकेला : राज्य सरकार भले ही पानी के लिए हर घर नल से जल का दावा करती रही है लेकिन सूरत-ए-हाल ठीक इसके उलट है। आधुनिक तकनीक, बेहतर सड़के और स्वच्ठ पानी इस गांव के लिए बेमानी है। जी हां, हम बात कर रहे हैं झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले की। इस जिले का एक गांव है हाई तिरुल।। यहां की महिलाओं को हर दिन करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर पश्चिम बंगाल की सीमा से पानी लाना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद न तो ‘हर घर नल से जल’ योजना का लाभ मिला और न ही स्थायी जलस्रोत की व्यवस्था हो सकी।

सरायकेला के हाई तिरुल गांव में पानी के लिए रोजाना संघर्ष

सरायकेला-खरसावां जिले का हाई तिरुल गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पेयजल संकट से जूझ रहा है। एक ओर सरकार हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर इस गांव की महिलाएं रोजाना करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर पश्चिम बंगाल से पानी लाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है।

हर घर नल से जल योजना का नहीं मिला लाभ

ग्रामीण महिलाओं के अनुसार वर्ष 2019 में गांव में एक बोरिंग कराई गई थी, जिससे कुछ समय तक लोगों को राहत मिली। हालांकि करीब एक वर्ष बाद ही वह खराब हो गई और उसके बाद से पेयजल की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी। कई बार संबंधित विभाग और प्रशासन को शिकायत देने के बावजूद अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ।

पश्चिम बंगाल के गड्ढे से भरते हैं पीने का पानी

पानी की तलाश में हाई तिरुल गांव की महिलाएं झारखंड की सीमा पार कर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बागमुंडी थाना क्षेत्र स्थित चड़क पाथर इलाके तक जाती हैं। खेतों के बीच बने एक गड्ढे से बाल्टी की मदद से पानी निकाला जाता है। इसके बाद उसे कपड़े से छानकर घर लाया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि इससे पानी केवल साफ दिखाई देता है, लेकिन वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होता।

  • दूषित पानी से बढ़ रहा बीमारियों का खतरा

गड्ढे का पानी पीने की मजबूरी के कारण गांव में जलजनित बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है। महिलाओं का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए वे इसी पानी को उबालकर पिलाती हैं। उनका मानना है कि स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं होने से पूरे गांव के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है।

फिलहाल चापाकल और कुएं की है सबसे बड़ी जरूरत

ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि उन्हें फिलहाल बड़ी योजनाओं से अधिक गांव में एक चापाकल, कुआं या स्थायी जलस्रोत की आवश्यकता है। उनका कहना है कि यदि गांव में पानी की स्थायी व्यवस्था हो जाए तो उन्हें रोजाना लंबी दूरी तय कर दूषित पानी लाने की मजबूरी से राहत मिल सकती है।

ग्राम प्रधान ने भी उठाई समस्या

गांव के प्रधान धीरेंद्र नाथ मांझी ने बताया कि वर्ष 2019 में गांव में एक जलमीनार बनाई गई थी, जिससे लगभग एक वर्ष तक लोगों को पानी मिला। इसके बाद जलमीनार बंद हो गई और फिर से ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं, को दो किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि हैंडपंप और नई पानी टंकी की मांग को लेकर जिला प्रशासन को कई बार आवेदन दिया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हकीकत यही है सरकारी मुलाजिम भी शहरी इलाके पर ही फोकस करते हैैं, जहां के लोग समर्थ हैं। उनके पास कई विकल्प हैं लेकिन जरूरत वैसे गांव और कस्बों में हैं जहां गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले बहुतायत हैं।

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