बिष्टुपुर की घटना ने कानून व्यवस्था व पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए
जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित एक बार में हुई हिंसक घटना अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गई है। यह शहर की कानून व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और आम नागरिकों के भरोसे की भी परीक्षा बन चुकी है।
दो युवकों पर हुए जानलेवा हमले में हिमांशु सिंह की इलाज के दौरान मौत हो गई। दूसरा युवक अब भी जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। इस घटना के बाद पूरे शहर में गहरा आक्रोश दिखाई दे रहा है। लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। सोशल मीडिया पर लगातार तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। दोषियों की गिरफ्तारी और जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।
हालांकि, पुलिस ने कुछ कर्मियों को निलंबित किया है। आरोपियों की गिरफ्तारी भी शुरू हुई है। लेकिन जनता का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब घटना के समय पुलिस मौके पर मौजूद थी, तब हिंसा को रोकने के लिए प्रभावी हस्तक्षेप क्यों नहीं किया गया।
दूसरी ओर, प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय लोगों के आरोप इस घटना को और गंभीर बना देते हैं। यदि पुलिस की मौजूदगी के बावजूद हमलावर युवकों को गश्ती वाहन से खींचकर हमला करने का साहस मिला, तो यह केवल अपराधियों की दुस्साहसिकता नहीं, बल्कि कानून के भय के कमजोर पड़ने का भी संकेत माना जाएगा।
इसी बीच, पुलिस प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आरोपियों को गिरफ्तार करना नहीं है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है जनता का विश्वास दोबारा हासिल करना। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा होता है। यदि वही कमजोर पड़ने लगे, तो कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
बिष्टुपुर की यह घटना निष्पक्ष और त्वरित जांच की मांग करती है। यदि कहीं लापरवाही हुई है, तो उसकी जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए। यही न्याय का आधार है और यही जनता की अपेक्षा भी। पुलिस की साख तभी मजबूत होगी, जब कार्रवाई केवल अपराधियों तक सीमित न रहे, बल्कि किसी भी स्तर पर हुई चूक की भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

