खरगे के करीबी प्रणव झा बने कांग्रेस उम्मीदवार, हेमंत सोरेन की सहमति के संकेत से मजबूत हुआ समीकरण
रांची। झारखंड से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपने युवा और संगठनात्मक रूप से मजबूत नेता प्रणव झा को उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और कांग्रेस अध्यक्ष कार्यालय से जुड़े प्रणव झा के नाम की घोषणा के साथ ही यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और झामुमो के बीच सहमति बन चुकी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस ने यह फैसला झामुमो नेतृत्व, विशेषकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सहमति के बाद ही लिया है। ऐसे में अब राज्यसभा चुनाव में प्रणव झा की जीत का रास्ता गठबंधन की एकजुटता और विधायकों के गणित पर निर्भर करेगा।
जीत का गणित: कांग्रेस को चाहिए गठबंधन का पूरा समर्थन
राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को केवल अपने विधायकों के भरोसे सफलता नहीं मिल सकती। विधानसभा में कांग्रेस के 16 विधायक हैं। ऐसे में आवश्यक मत संख्या तक पहुंचने के लिए उसे सहयोगी दलों का समर्थन अनिवार्य रूप से चाहिए।
राजनीतिक गणित के अनुसार कांग्रेस को अपने 16 विधायकों के अलावा झामुमो के अतिरिक्त छह विधायकों, राष्ट्रीय जनता दल के चार तथा भाकपा माले के दो विधायकों का समर्थन हासिल करना होगा। यदि गठबंधन के सभी विधायक प्रथम वरीयता मत कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में देते हैं तो प्रणव झा को जीत के लिए आवश्यक 28 वोट आसानी से मिल सकते हैं।
यही वजह है कि यह चुनाव केवल कांग्रेस का नहीं बल्कि पूरे इंडिया गठबंधन की एकजुटता की परीक्षा भी माना जा रहा है।
क्या हेमंत सोरेन की मंजूरी के बाद ही हुआ फैसला?
राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि प्रणव झा के नाम पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सहमति पहले ही मिल चुकी थी। सूत्रों के अनुसार उम्मीदवार घोषित होने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और हेमंत सोरेन के बीच दूरभाष पर बातचीत भी हुई थी।
इधर कांग्रेस के झारखंड प्रभारी पिछले दो दिनों से राज्य में सक्रिय हैं और लगातार झामुमो नेतृत्व के संपर्क में बने हुए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि उम्मीदवार चयन का निर्णय पूरी रणनीति और आपसी सहमति के बाद लिया गया है।
कौन हैं प्रणव झा?
प्रणव झा कांग्रेस संगठन में लंबे समय से सक्रिय और भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते हैं। मूल रूप से बिहार के भागलपुर जिले के कहलगांव स्थित आनंदीपुर गांव के निवासी प्रणव झा का झारखंड, विशेषकर बोकारो क्षेत्र से भी जुड़ाव बताया जाता है।
वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेहद करीबी नेताओं में उनकी पहचान है। पार्टी के संचार विभाग से जुड़े रहने के कारण संगठन और मीडिया प्रबंधन में उनकी विशेष भूमिका रही है।
दिल्ली की राजनीति में वर्षों से सक्रिय प्रणव झा को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया जाना कांग्रेस संगठन के भीतर उनके योगदान का बड़ा पुरस्कार माना जा रहा है।
सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश
कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन के जरिए कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। एक ओर पार्टी ने संगठन के प्रति समर्पित नेता को मौका दिया है, वहीं दूसरी ओर बिहार-झारखंड के सामाजिक समीकरणों को भी साधने का प्रयास किया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रणव झा का चयन कांग्रेस की उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें संगठन के निष्ठावान नेताओं को सम्मान देने के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
18 जून को होगा मतदान
राज्यसभा की रिक्त हो रही सीटों के लिए 18 जून को मतदान होगा। देश के 10 राज्यों की कुल 24 सीटों पर चुनाव कराए जाएंगे। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 21 जून से 19 जुलाई के बीच अलग-अलग तिथियों पर समाप्त हो रहा है।
झारखंड की सीट पर कांग्रेस ने प्रणव झा को मैदान में उतारकर राजनीतिक संदेश तो दे दिया है, लेकिन अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि झामुमो, राजद और माले के विधायक किस मजबूती से उनके पक्ष में लामबंद होते हैं। राज्यसभा की यह लड़ाई केवल एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि झारखंड में गठबंधन की एकजुटता और राजनीतिक भरोसे की भी परीक्षा बन गई है।
