July 26, 2026
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संपादकीय

जमशेदपुर से पर्यावरण चेतना का 22-23 मई को होगा नया शंखनाद

जमशेदपुर से पर्यावरण चेतना का 22-23 मई को होगा नया शंखनाद

बसंत कुमार सिंह

​सभ्यता के विकास और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने जिन दो प्राकृतिक संपदाओं को सबसे अधिक दांव पर लगाया है, वे हैं हमारे पर्वत और हमारी नदियां। यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि आजादी के सात दशकों बाद भी भारत जैसे प्रकृति-पूजक देश में पहाड़ों और नदियों के संरक्षण के लिए कोई स्पष्ट, समर्पित और स्वतंत्र कानून अस्तित्व में नहीं है। वन विभाग और सिंचाई विभाग के पास अपने नियम-कायदे जरूर हैं, लेकिन उनका दृष्टिकोण कभी भी नदी या पहाड़ को एक जीवंत और स्वतंत्र तंत्र के रूप में देखने का नहीं रहा। इसी विधिक शून्यता को भरने के लिए झारखंड की औद्योगिक और सांस्कृतिक राजधानी जमशेदपुर से एक अभूतपूर्व राष्ट्रव्यापी मुहिम का आगाज होने जा रहा है। 22 व 23 में को जमशेदपुर पश्चिम से जदयू विधायक और पर्यावरणविद् सरयू राय की पहल पर जमशेदपुर में आयोजित होने जा रहा दो दिवसीय ‘पर्वत एवं नदी सम्मेलन’ केवल एक बौद्धिक विमर्श नहीं, बल्कि देश के पर्यावरण इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

​इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका ठोस और व्यावहारिक दृष्टिकोण है। अमूमन पर्यावरण से जुड़े आयोजन केवल चिंताओं को रेखांकित करने और प्रस्ताव पारित करने तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन जमशेदपुर की इस धरती पर देश के प्रख्यात पर्यावरणविद, वैज्ञानिक और कानूनी विशेषज्ञ मिलकर एक ऐतिहासिक ‘विधिक ड्राफ्ट’ (कानूनी प्रारूप) तैयार करने जा रहे हैं। जलपुरुष की गरिमामयी मौजूदगी में तैयार होने वाले इस व्यापक मसौदे को सीधे केंद्र सरकार को सौंपा जाएगा। यह पहल इस सोच पर आधारित है कि जब तक प्रकृति के इन दो प्रहरियों को मजबूत कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक नीति-गत विसंगतियां हमारे पारिस्थितिक तंत्र को खोखला करती रहेंगी। अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर आए सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले और ‘पहाड़’ की परिभाषा को लेकर उपजा विवाद यह साबित करने के लिए काफी है कि देश में एक स्पष्ट और एहतियाती विधायी ढांचे की कितनी सख्त दरकार है।

​यह आंदोलन केवल कागजी कसरत नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध धरातल की कड़वी सच्चाई से है। साल 2006 में जब स्वर्णरेखा नदी के पानी के नमूनों को एकत्र कर इसकी गिरती सेहत पर बात शुरू हुई थी, तब शायद व्यवस्था ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन आज स्वर्णरेखा में ऑक्सीजन की कमी से मरती मछलियां और दम तोड़ती नदियां हमारे भविष्य के जल संकट की भयावह तस्वीर पेश कर रही हैं। हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट और अरावली तक की पर्वत श्रृंखलाएं आज अनियंत्रित पर्यटन, अंधाधुंध खनन और कंक्रीट के विस्तार से कराह रही हैं। जमशेदपुर से उठने वाली यह आवाज इन संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े बांधों, व्यावसायिक दोहन और भारी निर्माण पर कड़े प्रतिबंधों की वकालत करती है।

​सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मुहिम ‘नदी पंचायत’ और ‘क्षेत्र सभा’ जैसी अवधारणाओं के माध्यम से लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और सामुदायिक भागीदारी को इसका मूल आधार बनाती है। वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत स्थानीय आदिवासियों और पारंपरिक समुदायों के अधिकारों को अक्षुण्ण रखते हुए उन्हें इस संरक्षण योजना का प्रहरी बनाने का खाका खींचा गया है। यह संपादकीय इस बात को रेखांकित करता है कि नदियां और पहाड़ केवल भूगोल का हिस्सा नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों की आजीविका की रीढ़ हैं। जमशेदपुर से शुरू हो रहा यह विधिक और सामाजिक प्रयास यदि एक केंद्रीय कानून का रूप लेता है, तो यह पर्यावरण संरक्षण को केवल चर्चाओं के बंद कमरों से निकालकर धरातल पर एक जन-आंदोलन के रूप में स्थापित करेगा। समय आ गया है कि सरकार और नीति-निर्धारक जमशेदपुर से उठी इस गूंज को सुनें और इस ऐतिहासिक विधिक ढांचे को स्वीकार कर एक सुरक्षित भविष्य की नींव रखें।

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