हृदय रोग: युवाओं को भी बना रहा निशाना, रोकथाम ही सबसे कारगर इलाज


डॉ. तपन कुमार

आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जीवनशैली ने हृदय रोग को देश-दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती और जानलेवा बीमारियों में शामिल कर दिया है।
एक समय था जब इसे उम्रदराज़ लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। 30 से 40 वर्ष की उम्र के युवा भी हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर और धड़कन संबंधी गड़बड़ियों (अरीथमिया) के शिकार हो रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल करीब एक करोड़ लोग हृदय संबंधी बीमारियों के कारण जान गंवाते हैं। यह आंकड़ा न केवल भयावह है, बल्कि यह इस बात की चेतावनी भी देता है कि यदि हमने समय रहते सुधार नहीं किया, तो भविष्य और भी गंभीर हो सकता है।

दक्षिण एशियाई लोगों में जोखिम अधिक
2004 में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लांसेट में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशियाई आबादी में हृदयाघात (मायोकार्डियल इंफार्क्शन) की औसत उम्र मात्र 53 वर्ष पाई गई। यह अन्य देशों की तुलना में करीब 10 वर्ष कम है।

यह समय से पहले होने वाला आघात न सिर्फ स्वास्थ्य पर असर डालता है, बल्कि इससे परिवार की आर्थिक स्थिरता, सामाजिक संतुलन और उत्पादकता पर भी गहरा असर पड़ता है।

बीमारी के पीछे छिपे कारण
पारंपरिक जोखिम कारक:
उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन)
मधुमेह (डायबिटीज़)
कोलेस्ट्रॉल असंतुलन (डिस्लिपिडेमिया)
धूम्रपान
हर चार में से एक भारतीय वयस्क हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित है।
आधुनिक जीवनशैली की मार:
घंटों बैठकर काम करना
फास्ट फूड और प्रोसेस्ड भोजन का अत्यधिक सेवन
तनाव और नींद की कमी
व्यायाम की कमी
आनुवांशिक प्रवृत्ति:
दक्षिण एशियाई समुदाय में इंसुलिन रेज़िस्टेंस, पेट के आसपास चर्बी और छोटे, घने एलडीएल (बुरा कोलेस्ट्रॉल) की अधिकता पाई जाती है — भले ही बीएमआई सामान्य हो।

रोकथाम है सबसे सशक्त हथियार
हृदय रोगों के मामले में उपचार से ज्यादा जरूरी है रोकथाम। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि हम कुछ कदम समय रहते उठा लें, तो इन बीमारियों से बचा जा सकता है।

  1. जनस्तरीय पहल:
    तंबाकू पर सख्त कर, नमक और ट्रांस-फैट की खपत पर नियंत्रण
    फास्ट फूड, चीनी और घातक वसा से परहेज़
    फल, सब्ज़ियाँ और साबुत अनाज को आहार का हिस्सा बनाना
  2. क्लिनिकल स्तर पर रोकथाम:
    जोखिम का मूल्यांकन 30 वर्ष की उम्र से ही शुरू करें, विशेषकर उच्च जोखिम वाले लोगों में
    कार्यस्थल पर नियमित स्वास्थ्य जांच, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी
    डिजिटल हेल्थ तकनीकों का इस्तेमाल – जैसे स्मार्टवॉच, एआई-आधारित ECG विश्लेषण, रिमोट मॉनिटरिंग
    चेतावनी संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें:
    सीने में भारीपन या दर्द
    सांस फूलना
    अत्यधिक पसीना
    तेज़ धड़कन
  3. जीवनशैली में सुधार:
    नियमित व्यायाम — तेज़ चलना भी लाभकारी
    योग और ध्यान के ज़रिए तनाव प्रबंधन
    नींद पूरी करना – 7 से 8 घंटे की गहरी नींद
    धूम्रपान और शराब से दूरी
    ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की कमी
    अब भी देश के कई ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में प्रारंभिक पहचान और उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
    अक्सर लक्षण सामने आने के बाद भी मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते, जिससे उनकी जान को खतरा बढ़ जाता है।

यद्यपि आधुनिक कार्डियक तकनीकों – जैसे एंजियोप्लास्टी, सीएबीजी (बायपास सर्जरी) और हार्ट फेल्योर प्रबंधन में भारत ने बड़ी प्रगति की है, लेकिन रोकथाम संबंधी रणनीतियों में अपेक्षित निवेश और जागरूकता अब भी कम है ।

बीमारी नहीं, नजरिया बदलना होगा
हृदय रोगों की बढ़ती रफ्तार निश्चित रूप से चिंताजनक है, लेकिन यह समस्या अपरिवर्तनीय नहीं है। हृदय रोग अब भी ऐसे क्रॉनिक रोगों में शामिल हैं जिन्हें सबसे प्रभावी रूप से रोका जा सकता है — यदि व्यक्ति, समाज और सरकार मिलकर सक्रिय कदम उठाएं।

इस दिशा में सबसे बड़ा बदलाव तभी संभव है जब हम खानपान, व्यायाम, मानसिक स्वास्थ्य और नियमित स्वास्थ्य जांच को जीवनशैली का हिस्सा बना लें।

लेखक परिचय:
डॉ. तपन कुमार
इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट एवं सीनियर कंसल्टेंट
हृदय रोग विभाग, टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच), जमशेदपुर

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