दूसरी पुण्यतिथि पर विशेष : कोल्हान में दैनिक पत्रकारिता की नींव रखने वाले उस संपादक को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने खबर को कभी बाजार या सत्ता के हवाले नहीं होने दिया
ईश्वर कृष्ण ओझा
आज, 1 जून 2026 को जमशेदपुर और पूरा कोल्हान क्षेत्र पत्रकारिता के एक ऐसे पुरोधा को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा है, जिनका नाम इस क्षेत्र की मीडिया यात्रा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह दिन हिंदी दैनिक उदितवाणी के संस्थापक-संपादक राधेश्याम अग्रवाल की दूसरी पुण्यतिथि का दिन है। पत्रकारिता जगत में उन्हें सम्मान और स्नेह के साथ “अग्रवाल साहब” के नाम से जाना जाता था। वे केवल एक संपादक या अखबार के संस्थापक नहीं थे, बल्कि कोल्हान में आधुनिक दैनिक पत्रकारिता के सूत्रधार, मार्गदर्शक और पितामह थे।
आज जब जमशेदपुर देश के महत्वपूर्ण मीडिया शहरों में अपनी पहचान रखता है, तब इस उपलब्धि की जड़ों में यदि किसी एक व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान खोजा जाए तो उसमें अग्रवाल साहब का नाम सबसे ऊपर दिखाई देता है। उन्होंने उस दौर में दैनिक पत्रकारिता का सपना देखा, जब इस क्षेत्र में इसकी कल्पना तक नहीं की जाती थी।
22 अगस्त 1980 को जब उन्होंने जमशेदपुर से हिंदी दैनिक उदितवाणी का प्रकाशन शुरू किया, तब पूरे कोल्हान क्षेत्र में कोई दैनिक हिंदी समाचार पत्र नहीं था। उस समय सूचना के साधन सीमित थे, समाचारों तक लोगों की पहुंच भी आसान नहीं थी। अखबार पढ़ने की संस्कृति भी आज जैसी विकसित नहीं थी। ऐसे वातावरण में एक दैनिक समाचार पत्र शुरू करना केवल व्यावसायिक निर्णय नहीं था, बल्कि सामाजिक चेतना का एक बड़ा अभियान था।
अग्रवाल साहब ने केवल एक समाचार पत्र की स्थापना नहीं की, बल्कि उन्होंने इस क्षेत्र में पत्रकारिता की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिस पर आगे चलकर पूरे मीडिया उद्योग का विस्तार हुआ। आज कोल्हान में जितने भी समाचार माध्यम सक्रिय हैं, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वे उस पत्रकारिता संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं, जिसकी शुरुआत उदित वाणी ने की थी।
पत्रकारिता की दुनिया में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होती है। यह पूंजी धन से नहीं, बल्कि वर्षों के त्याग, सिद्धांतों और जनविश्वास से अर्जित होती है। राधेश्याम अग्रवाल ने अपने पूरे जीवन में इसी पूंजी को सबसे अधिक महत्व दिया। उन्होंने कभी भी समाचार को किसी व्यक्ति, संस्था, राजनीतिक दल या औद्योगिक घराने के हितों के अनुरूप ढालने की कोशिश नहीं की।
उनके लिए पत्रकारिता का अर्थ था समाज के प्रति जवाबदेही। वे मानते थे कि अखबार का पहला दायित्व उसके पाठकों के प्रति होता है, न कि सत्ता, बाजार या किसी प्रभावशाली वर्ग के प्रति। यही कारण था कि तमाम दबावों और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया।
उनकी संपादकीय दृष्टि स्पष्ट थी। वे खबर को खबर की तरह प्रस्तुत करने में विश्वास रखते थे। पत्रकारिता को किसी विचारधारा, संगठन या सत्ता प्रतिष्ठान का प्रचार माध्यम बनाने के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने कभी किसी राजनीतिक दल का झंडा उठाकर पत्रकारिता नहीं की और न ही किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान के साथ समीकरण बनाकर अखबार चलाया। यही स्वतंत्रता और निष्पक्षता उन्हें अपने समकालीनों से अलग पहचान देती थी।
उदित वाणी की सबसे बड़ी ताकत उसका पाठक वर्ग रहा है। यह विश्वास यूं ही नहीं बना। इसके पीछे अग्रवाल साहब की वह सोच थी, जिसमें अखबार को जनता का मंच माना गया। वे हमेशा कहते थे कि अखबार पाठकों के लिए निकलता है और उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी पाठकों के प्रति होती है।
शायद यही कारण है कि उदित वाणी को लोगों ने अपना अखबार माना। यह केवल समाचारों का संग्रह नहीं रहा, बल्कि जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बना। आम लोगों की समस्याएं, जनहित के मुद्दे और समाज की आवाज को जिस गंभीरता से उदित वाणी ने स्थान दिया, उसने उसे जनता के बीच विशेष पहचान दिलाई।
अग्रवाल साहब की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी उनकी अद्भुत समाचार दृष्टि। वे खबरों के बड़े पारखी माने जाते थे। उन्हें यह समझने की असाधारण क्षमता थी कि कौन-सा विषय पाठकों के लिए महत्वपूर्ण है और कौन-सी खबर समाज पर प्रभाव डाल सकती है। वे केवल घटनाओं को नहीं देखते थे, बल्कि उनके पीछे छिपे सामाजिक और राजनीतिक संकेतों को भी समझते थे।
विशेष रूप से राजनीतिक और चुनावी पत्रकारिता में उनकी पकड़ उल्लेखनीय थी। लगभग 44 वर्षों तक संपादक के रूप में उन्होंने लोकसभा और विधानसभा के अनेक चुनावों को बहुत करीब से देखा। राजनीतिक परिस्थितियों, जनभावनाओं और चुनावी रुझानों को समझने की उनकी क्षमता इतनी सटीक थी कि अधिकांश अवसरों पर उनके आकलन वास्तविक परिणामों के बेहद करीब साबित हुए। राजनीतिक विश्लेषण की यह क्षमता उन्हें क्षेत्र के सबसे सम्मानित संपादकों में शामिल करती थी।
एक संपादक केवल समाचारों का चयन नहीं करता, वह आने वाली पीढ़ियों के पत्रकारों को भी दिशा देता है। अग्रवाल साहब ने भी यही किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक पत्रकारों ने अपने करियर की शुरुआत की और पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को सीखा। उन्होंने नई पीढ़ी को यह समझाया कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व है।
उनकी कार्यशैली में अनुशासन, गंभीरता और गुणवत्ता के प्रति आग्रह साफ दिखाई देता था। वे छोटी से छोटी खबर को भी गंभीरता से देखते थे और तथ्यों की शुद्धता पर विशेष बल देते थे। उनके लिए पत्रकारिता में जल्दबाजी से अधिक महत्वपूर्ण था सत्य और विश्वसनीयता।
आज मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में सूचना का प्रवाह पहले से कहीं अधिक तेज हो गया है। लेकिन इसी के साथ पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता का संकट भी गहराता जा रहा है। अपुष्ट सूचनाएं, अफवाहें, सनसनी और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने पत्रकारिता के मूल्यों को चुनौती दी है।
ऐसे समय में राधेश्याम अग्रवाल जैसे पत्रकार और संपादक और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने जिस पत्रकारिता का आदर्श प्रस्तुत किया था, वह आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने सिखाया कि तकनीक बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा नहीं बदलनी चाहिए। और पत्रकारिता की आत्मा है—विश्वसनीयता।
यदि समाचार माध्यमों से विश्वसनीयता समाप्त हो जाए, तो उनका अस्तित्व केवल एक ढांचे तक सीमित रह जाता है। पाठकों का विश्वास ही पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति है। अग्रवाल साहब ने अपने जीवन और कार्यों से यही संदेश दिया कि समाचार पत्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसका पाठक और उसका विश्वास होता है।
आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक व्यक्ति को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उन मूल्यों को याद करना है, जिन्होंने पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ बनाया। यह अवसर उनके योगदान को स्मरण करने के साथ-साथ स्वयं से यह प्रश्न पूछने का भी है कि क्या हम उस पत्रकारिता को बचा पा रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था।
राधेश्याम अग्रवाल भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विचारधारा, उनके सिद्धांत, उनकी संपादकीय दृष्टि और उनकी बनाई हुई पत्रकारिता की परंपरा आज भी जीवित है। उदित वाणी के प्रत्येक अंक में, पत्रकारिता के प्रत्येक मूल्य में और पाठकों के प्रत्येक विश्वास में उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है।
उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर कोल्हान की धरती अपने इस महान पत्रकार, संपादक और मार्गदर्शक को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है।
कोटि-कोटि नमन। विनम्र श्रद्धांजलि।

