जमशेदपुर : ग्रेजुएट कॉलेज के बी.एड विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को सफल समापन हुआ। संगोष्ठी में शिक्षा, अनुसंधान, भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। देशभर से आए शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्राओं की सक्रिय भागीदारी रही।
ग्रेजुएट कॉलेज के बी.एड विभाग द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को सफल समापन हुआ। संगोष्ठी में शिक्षा, अनुसंधान, भारतीय ज्ञान परंपरा और विकसित भारत जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। देशभर से आए शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्राओं की सक्रिय भागीदारी रही।
कॉलेज के बी.एड विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं कुलगीत के साथ हुई। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव राहुल कुमार पुरवार थे। उन्होंने विकसित भारत के चार प्रमुख स्तंभ—युवा, महिलाएं, गरीब और किसान—बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों को वार्षिक कैलेंडर और अनुशासन का पालन करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए, जो समस्याओं के समाधान में सहायक बने।
संगोष्ठी की मुख्य संरक्षक एवं कोल्हान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर डॉ अजिला गुप्ता ने अपने संबोधन में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने वेद, आयुर्वेद और उपनिषदों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है।
मुख्य वक्ता विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर चंद्रभूषण शर्मा ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों को शिक्षित करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की मार्गदर्शक भी है। उन्होंने गुरु को समाज की ‘सेंटर पावर’ बताया।
कोल्हान विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ रंजीत कुमार कर्ण ने कहा कि विकसित भारत के दो प्रमुख आधार रिसर्च और डेवलपमेंट हैं। यदि देश को विकसित बनाना है तो नई खोज, अनुसंधान और समस्या समाधान की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
कॉलेज की प्राचार्या डॉ वीणा सिंह प्रियदर्शी ने अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र, प्रतीक चिन्ह और पौधा भेंट कर किया। स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि बाहरी आक्रमणकारियों और विशेषकर मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, लेकिन नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय शिक्षा पद्धति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है।
विषय प्रवेश बी.एड विभाग की प्रीति सिंह ने कराया। मंच संचालन संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ अर्चना सिन्हा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन बी.एड विभागाध्यक्ष डॉ विश्वेश्वर यादव ने दिया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्राएं शामिल हुईं।
कार्यक्रम के विभिन्न अकादमिक सत्रों में अलग-अलग चेयरपर्सन और रिपोर्टीयर नियुक्त किए गए। प्रथम सत्र में डॉ परशुराम सियोल चेयरपर्सन और डॉ इरशाद खान रिपोर्टीयर रहे। द्वितीय सत्र में डॉ संजय भुइयां और डॉ समीउल्लाह, तृतीय सत्र में डॉ मोहना सुशांत पंडित और डॉ लक्ष्मण गोप तथा चतुर्थ सत्र में डॉ संजीव आनंद और डॉ शिव प्रकाश ने जिम्मेदारी निभाई।
16 मई को आयोजित प्लेनरी सत्र में राजेंद्र राजकीय विश्वविद्यालय, बोलांगीर (उड़ीसा) के कुलपति डॉ विभूति भूषण मल्लिक मुख्य अतिथि रहे। वहीं, डॉ रंजीत प्रसाद, डॉ एम ए हाशमी और डॉ तनवीर युनुस रिसोर्स पर्सन के रूप में शामिल हुए। सभी अतिथियों को प्राचार्या डॉ वीणा सिंह प्रियदर्शी ने सम्मानित किया।
पांचवें सत्र में डॉ एस पी महालिक और डॉ समीउल्लाह तथा छठे सत्र में डॉ मोहम्मद मोईज अशरफ और डॉ दारा सिंह गुप्ता ने क्रमशः चेयरपर्सन एवं रिपोर्टीयर की भूमिका निभाई। संगोष्ठी का एक सत्र ऑनलाइन भी आयोजित किया गया, जिसमें विभिन्न राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि डॉ दारा सिंह गुप्ता थे। अंत में आयोजक सचिव डॉ विश्वेश्वर यादव ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान के साथ हुआ।



