August 10, 2026
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जमशेदपुर

JAMSHEDPUR जमशेदपुर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही बट सावित्री पूजा, वट वृक्षों पर उमड़ी सुहागिन महिलाओं की भीड़

JAMSHEDPUR जमशेदपुर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जा रही बट सावित्री पूजा, वट वृक्षों पर उमड़ी सुहागिन महिलाओं की भीड़

जमशेदपुर : शहर में शनिवार को बट सावित्री पूजा श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाई जा रही है। सुबह से ही विभिन्न इलाकों में सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना कर रही हैं। शहर के कई मंदिरों और वट वृक्षों के आसपास महिलाओं की भारी भीड़ देखी गई।

सुबह स्नान के बाद महिलाएं पारंपरिक परिधान और सोलह श्रृंगार में पूजा स्थलों पर पहुंचीं। पूजा के दौरान महिलाओं ने वट वृक्ष पर जल अर्पित किया, रोली-अक्षत चढ़ाए और कच्चा सूत लपेटकर वृक्ष की परिक्रमा की। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण कर परिवार की खुशहाली और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना की।

बट सावित्री पूजा को लेकर शहर के बाजारों में भी सुबह से रौनक बनी रही। फल, फूल, पूजा सामग्री, बांस के पंखे, नारियल, आम, केला और श्रृंगार सामग्री की दुकानों पर महिलाओं की भीड़ उमड़ती रही। कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की और पारंपरिक लोकगीत गाकर उत्सव का आनंद लिया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार बट सावित्री व्रत अखंड सौभाग्य और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक माता सावित्री ने अपने तप, त्याग और अटूट संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

सावित्री-सत्यवान की कथा

मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अपनी बुद्धिमत्ता, धर्मनिष्ठा और पतिव्रता धर्म के लिए प्रसिद्ध थीं। उन्होंने साल्व राज्य के निर्वासित और नेत्रहीन राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। हालांकि, सत्यवान अल्पायु थे और उनकी आयु बहुत कम बताई गई थी।

एक दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, जहां अचानक उनकी मृत्यु हो गई। जब यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। सावित्री की अटूट निष्ठा, ज्ञान और समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने का अवसर दिया।

सावित्री ने बड़ी चतुराई से पहले अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा, फिर अपने माता-पिता के लिए संतान का वरदान लिया और अंत में सत्यवान से 100 पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद मांग लिया। यमराज को अपना वरदान पूरा करने के लिए सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। इस प्रकार सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवन दिलाया।

वट सावित्री व्रत का महत्व

अखंड सौभाग्य का प्रतीक:
मान्यता है कि इस व्रत को करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और पति की लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

वट वृक्ष का धार्मिक महत्व:
हिंदू धर्म में वट यानी बरगद के वृक्ष को अमरत्व का प्रतीक माना गया है। इसकी गहरी और विस्तृत जड़ों के कारण इसे स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है।

दीर्घायु और परिवार की समृद्धि की कामना:
महिलाएं वट वृक्ष की तरह अपने पति और परिवार के सुख, समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती हैं।

पूजा की विधि

व्रत और श्रृंगार:
सुबह स्नान के बाद महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं।

वट वृक्ष की पूजा:
बरगद के पेड़ की जड़ में जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद पेड़ के तने पर कच्चा सूत या कलावा बांधकर 7, 21 या 108 बार परिक्रमा की जाती है।

कथा श्रवण:
पूजा के दौरान महिलाएं हाथ में चना और भीगे हुए अंकुरित अनाज लेकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

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