अग्रे और मालवन एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट जल्द होंगे नौसेना में शामिल, पाकिस्तानी हांगोर पनडुब्बियों का शिकार करने की तैयारी पूरी

नई दिल्ली, 5 जून (आईएएनएस)। भले ही पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति कमजोर हो, लेकिन रक्षा खरीद के लिए उसके पास संसाधनों की कमी शायद ही कभी दिखाई देती है। इसमें उसका सबसे बड़ा सहयोगी चीन है, जो पाकिस्तान की सेना, नौसेना और वायुसेना के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

इसी क्रम में अंडरवॉटर वॉरफेयर क्षमता को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने चीन के साथ प्रोजेक्ट एस-26 के तहत आठ युआन क्लास एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) पनडुब्बियां खरीदने का समझौता किया था। दूसरी ओर, भारतीय नौसेना ने भी दुश्मन की पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (एएसडब्ल्यू) शैलो वॉटर क्राफ्ट परियोजना पर तेजी से काम किया। नौसेना के अनुसार, अब तक चार एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट- आईएनएस अर्णाला, आईएनएस अंद्रोत्त, आईएनएस माहे और आईएनएस अंजदीप- नौसेना में शामिल किए जा चुके हैं।

इसी श्रृंखला में ‘अग्रे’ और ‘मालवन’ भी जल्द ही भारतीय नौसेना का आधिकारिक हिस्सा बन जाएंगे। इन दोनों पोतों को पहले ही नौसेना को सौंपा जा चुका है। वर्ष 2019 में 16 एएसडब्ल्यू शैलो वॉटर क्राफ्ट के निर्माण का अनुबंध किया गया था। इनमें से आठ का निर्माण कोचिन शिपयार्ड में और आठ का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई), कोलकाता में किया जा रहा है।

इन युद्धपोतों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी उन्नत एंटी-सबमरीन क्षमता है। ये एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, लाइटवेट टॉरपीडो, 30 मिमी नौसैनिक तोप, एएसडब्ल्यू कॉम्बैट सूट, हल-माउंटेड सोनार और लो-फ्रीक्वेंसी वैरिएबल डेप्थ सोनार से लैस हैं। ये लगभग 25 नॉट की गति से संचालित हो सकते हैं और एक बार में करीब 3,300 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकते हैं। तट से 100 से 150 नॉटिकल मील की दूरी तक दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने की क्षमता इन्हें बेहद प्रभावी बनाती है।

यह 30 से 40 मीटर की गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में संचालित होने वाली पनडुब्बियों को खोजने, उनका पीछा करने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। इसके अलावा यह बड़े युद्धपोतों के लिए समुद्री मार्ग को सुरक्षित और बाधामुक्त बनाने का कार्य भी करता है।

पाकिस्तान की चीनी मूल की हांगोर क्लास की पहली पनडुब्बी इस समय हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद है। खुफिया सूचनाओं के अनुसार यह पनडुब्बी चीन से रवाना होकर मलेशिया और इंडोनेशिया के रास्ते सुंडा जलडमरूमध्य से गुजरते हुए वर्तमान में श्रीलंका में ठहरी हुई है। इसका अंतिम गंतव्य कराची नौसैनिक अड्डा है।

सूत्रों के अनुसार चीन से रवाना होने के बाद इस पनडुब्बी ने अब तक एक बार भी गोता नहीं लगाया है और पूरी यात्रा सतह पर रहते हुए तय की है। इसे दो पाकिस्तानी युद्धपोत—पीएनएस तैमूर और पीएनएस असलत—एस्कॉर्ट कर रहे हैं। जल्द ही यह अरब सागर के रास्ते कराची पहुंचेगी। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक इस पनडुब्बी पर पाकिस्तानी और चीनी, दोनों देशों के चालक दल मौजूद हैं।

पाकिस्तान की आठ हांगोर क्लास पनडुब्बियों में से चार का निर्माण चीन में और शेष चार का निर्माण कराची शिपयार्ड में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) के तहत किया जा रहा है। हांगोर क्लास, चीन की टाइप-039बी युआन क्लास पनडुब्बी का निर्यात संस्करण है। वर्ष 2015 में चीन और पाकिस्तान के बीच लगभग 5 से 6 अरब डॉलर का समझौता हुआ था।

हालांकि, हांगोर क्लास पनडुब्बियां अपेक्षाकृत नई हैं, लेकिन विभिन्न रिपोर्टों में इनमें कुछ तकनीकी कमियों की ओर भी संकेत किया गया है। इनमें प्रोपल्शन सिस्टम और सेंसर से जुड़ी चुनौतियां प्रमुख हैं। आकार में बड़ी होने के कारण इसकी गतिशीलता भी सीमित मानी जाती है।

रिपोर्टों के अनुसार प्रतिबंधों के कारण जर्मनी के एमटीयू डीजल इंजन उपलब्ध नहीं हो सके, जिसके चलते चीन को अपने सीएचडी-620 इंजन का उपयोग करना पड़ा। किसी भी पनडुब्बी की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्टील्थ यानी गुप्त रूप से संचालन करने की क्षमता होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ चीनी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां आधुनिक पश्चिमी पनडुब्बियों की तुलना में अधिक शोर उत्पन्न करती हैं, जिससे उनका पता लगाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

एआईपी (एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन) प्रणाली को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। रक्षा जानकारों का कहना है कि चीन की यह तकनीक अभी पूरी तरह परखी नहीं गई है और इसकी विश्वसनीयता को लेकर संदेह बना हुआ है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान को उपलब्ध कराई जा रही तकनीक चीन की अपनी नौसेना में इस्तेमाल हो रही अत्याधुनिक प्रणालियों की तुलना में कम उन्नत है।

डीकेपी

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