चंद्रदेव सिंह राकेश

जमशेदपुर: भारतीय राजनीति में नेताओं की पहचान अक्सर उनके चुनावी समीकरणों, भाषणों और दलीय निष्ठा से होती है। लेकिन इस स्थापित परिपाटी से इतर एक ऐसा राजनेता भी है, जिसकी राजनीति भले ही उसकी ‘रोजी-रोटी’ हो, लेकिन उसका दिल सिर्फ और सिर्फ पर्यावरण संरक्षण के लिए धड़कता है।
हम बात कर रहे हैं जमशेदपुर पश्चिम से जदयू विधायक सरयू राय की। सरयू राय महज एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी जुझारू शख्सियत हैं जिन्होंने पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनी ही राजनीतिक यात्रा में अवरोधों को हंसते-हंसते स्वीकार किया और व्यक्तिगत नुकसान की कभी परवाह नहीं की।
आज जब 22 और 23 मई को जमशेदपुर में ‘पर्वत एवं नदी’ पर एक भव्य राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन होने जा रहा है, तो यह सरयू राय के दशकों पुराने पर्यावरण आंदोलन में एक और नया और ऐतिहासिक अध्याय जोड़ने जैसा है। आइए जानते हैं सोन नहर से लेकर स्वर्णरेखा नदी तक की उनकी इस अविश्वसनीय और प्रेरणादायी यात्रा को।
1. 1980-90 का दशक: सोन नहर आंदोलन व लालू यादव से सीधी टक्कर
सरयू राय के भीतर का पर्यावरणविद् आज का नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें चार दशक पुरानी हैं। 1980 और 90 के दशक में, जब अविभाजित बिहार में पर्यावरण जैसे मुद्दे मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा भी नहीं हुआ करते थे, तब सरयू राय ने ‘सोन नहर संरक्षण’ को लेकर एक अभूतपूर्व मुहिम का आगाज किया था।
उस कालखंड में उन्होंने एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में भी काम किया। पत्रकारिता के जरिए उन्होंने पर्यावरण जागरूकता को एक नया तेवर, नई धार और नया कलेवर दिया। सोन नहर के अस्तित्व और उसकी शुद्धता को लेकर वे इस कदर संवेदनशील थे कि उन्होंने समय की सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्सियत और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से भी सीधे टकराने में संकोच नहीं किया। तमाम राजनीतिक झंझावातों, धमकियों और दबावों को झेलते हुए भी सरयू राय डिगे नहीं और सोन नहर की अपनी इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लिया।
2. जब बिहार से झारखंड आए और ‘दामोदर’ के रक्षक बन गए
वक्त का पहिया घूमा और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति के सिलसिले में सरयू राय को तब के दक्षिण बिहार (और आज के झारखंड) का प्रभारी बनाकर भेजा गया। नियति को कुछ और ही मंजूर था; सरयू राय झारखंड की माटी के ही होकर रह गए।
झारखंड आते ही उन्होंने देखा कि यहां के जंगल और नदियां औद्योगिक कचरे और मानवीय उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहे हैं। उन्होंने सबसे पहले गुमला के इलाके में जंगलों को बचाने और वन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए कई जमीनी जतन किए। इसके बाद उनकी नजर गई झारखंड की जीवनरेखा कही जाने वाली ‘दामोदर नदी’ पर। दामोदर नदी उस वक्त उद्योगों के जहरीले कचरे के कारण काली पड़ चुकी थी और उसे ‘जैविक मरुस्थल’ कहा जाने लगा था। सरयू राय ने दामोदर को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए अकेले आवाज बुलंद की, जो बाद में एक विशाल जन-आंदोलन में बदल गई।
3. स्वर्णरेखा नदी को बनाया मिशन: कड़ा रुख व कॉर्पोरेट जगत से टकराव
दामोदर के बाद सरयू राय ने ‘स्वर्णरेखा नदी’ को अपने जीवन का सबसे बड़ा मिशन बनाया। उन्होंने नदी की सेहत सुधारने के लिए अनेक स्थानों पर जन-जागरूकता कार्यक्रम किए, पदयात्राएं कीं और आंदोलन का शंखनाद किया।
इस मुहिम के दौरान उनका सामना देश के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों से हुआ, जो नदियों में अपना कचरा बहा रहे थे। किसी और नेता के लिए कॉर्पोरेट जगत से टकराना राजनीतिक आत्महत्या जैसा हो सकता था, लेकिन सरयू राय ने बिना डरे तत्कालीन सरकारों को उंगली दिखाकर व्यवस्था की कमियों से अवगत कराया। उन्होंने देश भर के स्वयंसेवी संगठनों (NGOs) और नामचीन पर्यावरणविदों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया। इसी एकजुटता का नतीजा था कि ‘युगांतर भारती’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से दामोदर और स्वर्णरेखा नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के अभियान को एक नई धार मिली।
4. आलोचकों के निशाने पर रहे, पर कभी नहीं भटके
ऐसा नहीं है कि सरयू राय की इस राह में कांटे नहीं थे। जब कोई राजनेता पर्यावरण जैसे अराजनैतिक मुद्दे को उठाता है, तो संशय पैदा होना लाजिमी है। सरयू राय भी अपने आलोचकों के निशाने पर रहे। कई लोगों ने उनकी पर्यावरण मुहिम के पीछे छिपी राजनीति को खोजने की कोशिश की, तो कई ने इसे महज एक ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार दिया। कई ने इसे उगाही का जरिया भी बताया था।
लेकिन सरयू राय इन सभी आलोचनाओं से बेअसर रहे। वे अपने मार्ग से कभी नहीं भटके और न ही उन्होंने कभी किसी के सामने घुटने टेके। उनके लिए पर्यावरण कोई चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा एक पवित्र संकल्प था।
5. जमशेदपुर राष्ट्रीय सम्मेलन: आंदोलन में एक नए स्वर्णिम अध्याय का सूत्रपात
अब 22 और 23 मई को जमशेदपुर की धरती एक और ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बनने जा रही है। सरयू राय के नेतृत्व में यहाँ ‘पर्वत और नदी’ पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का मकसद देश में नदियों और पहाड़ों के संरक्षण के लिए एक ठोस ‘विधिक कानून’ (Legal Framework) का ड्राफ्ट तैयार करना है।
यह आयोजन सरयू राय के जीवन भर के संघर्ष का एक निचोड़ है। यह सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि एक अकेला व्यक्ति भी यदि ठान ले, तो वह देश की नीतियों को बदलने और प्रकृति को उसका हक दिलाने के लिए व्यवस्था को विवश कर सकता है।
क्यों खास हैं पर्यावरणविद् सरयू राय?
सीधे शब्दों में कहें तो सरयू राय का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि राजनीति में रहते हुए भी अपनी अंतरात्मा की आवाज को कैसे जिंदा रखा जाता है। वे चाहते तो मंत्रियों की कतार में शामिल होकर मलाईदार विभागों के फेर में अपनी पहचान खो सकते थे, लेकिन उन्होंने नदियों की कलकल और पहाड़ों की खामोशी को अपनी आवाज बनाया। आज 22 मई को जमशेदपुर से शुरू हो रही यह नई पहल देश के पर्यावरण इतिहास को एक नई दिशा देगी, और इसके सूत्रधार के रूप में सरयू राय का नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाएगा।
