जमशेदपुर में खाकी के साए में उजड़ा सुहाग: मानगो की बिटिया के वो 10 महीने, जो जिंदगी भर का अंधेरा बन गए

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10 माह पहले हुई शादी,मानगो की नवविवाहिता के परिजनों ने पुलिस की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

मुख्य बिंदु:

  • पुलिस वैन से खींचकर युवक पर जानलेवा हमला, इलाज के दौरान मौत
  • सिर्फ 10 महीने पहले हुई थी शादी, गुरुद्वारा रोड इलाके में मातम का माहौल
  • परिजनों ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की

जमशेदपुर / आदित्यपुर: झारखंड की औद्योगिक राजधानी कहा जाने वाला शहर जमशेदपुर आज एक ऐसे खौफनाक सवाल के सामने निरुत्तर खड़ा है, जिसने न सिर्फ कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी तार-तार कर दिया है।

बिष्टुपुर के एक व्यावसायिक क्षेत्र में स्थित बीयर बार से शुरू हुआ मामूली विवाद जब पुलिस की गाड़ी के भीतर तक पहुंचकर एक नौजवान की सरेआम मौत का सबब बन जाए, तो न्याय व्यवस्था पर से आम इंसान का भरोसा डगमगाना लाजिमी है।

यह कहानी सिर्फ एक जघन्य वारदात की नहीं है, यह कहानी उस उजड़े हुए सिंदूर और टूट चुके ख्वाबों की है, जो महज दस महीने पहले सजे थे।

​10 महीने की खुशियां और ताउम्र का मातम

​सरायकेला खरसावां जिला करणी सेना के युवा अध्यक्ष और आदित्यपुर निवासी हिमांशु सिंह की ससुराल मानगो के गुरुद्वारा रोड (विश्वनाथ मंदिर के सामने) में है। वही गुरुद्वारा रोड, जहां ठीक दस महीने पहले शहनाइयां गूंजी थीं। राजू सिंह की लाडली रिचा ने बड़े-बड़े अरमानों के साथ हिमांशु का हाथ थामा था। बेटी की शादी के लिए मायके की दीवारों पर कराया गया नया रंग-रोगन आज भी जस का तस चमक रहा है, लेकिन उस रंग को निहारने वाली रिचा की जिंदगी का हर रंग पल भर में बेरंग हो चुका है।

उसका सुहाग उजड़ चुका है, उसके ख्वाब खत्म हो चुके हैं, और उसकी पूरी जिंदगी में ऐसा अंधेरा छा गया है जिसकी कोई सुबह नहीं दिखती।

पुलिस की गाड़ी बनी मौत का फंदा: सुरक्षा के भरोसे का कत्ल

​शनिवार की वो मनहूस रात कोई नहीं भूल सकता।

बीयर बार में हुए विवाद के बाद अपनी जान पर मंडराते खतरे को भांपकर हिमांशु सिंह ने भागकर अपनी सुरक्षा की खातिर पुलिस की गाड़ी (वैन) में शरण ली थी।

एक आम नागरिक मुसीबत में पुलिस की तरफ ही उम्मीद से देखता है। हिमांशु को भी लगा होगा कि खाकी की मौजूदगी का मतलब है ‘जिंदगी की गारंटी’।

​लेकिन अपराधियों के बुलंद हौसलों के आगे खाकी बौनी साबित हुई। पुलिस के सामने, पुलिस की वैन से खींचकर हिमांशु को बेरहमी से चाकुओं से गोद दिया गया।

इस खूनी खेल में हिमांशु का एक अन्य साथी भी गंभीर रूप से जख्मी हो गया, जो आज अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच अंतिम सांसें गिन रहा है।

लहूलुहान हिमांशु को टाटा मुख्य अस्पताल (TMH) में भर्ती कराया गया, जहां सोमवार की शाम उन्होंने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों की तमाम कोशिशें और परिजनों की चौबीसों घंटे की दुआएं भी होनी को टाल न सकीं।

एक बेबस पिता के तीखे सवाल: क्या पुलिस की भी संलिप्तता है?

​इस भयावह घटना के बाद गहरे सदमे में डूबे हिमांशु के ससुर राजू सिंह का एक ही सवाल है, जो सीधे प्रशासन की अंतरात्मा पर चोट करता है— "आखिर कोई पुलिस के पास मदद के लिए ही तो जाता है? ऐसी स्थिति में पुलिस का क्या कर्तव्य बनता है?"

​राजू सिंह ने भरे गले और आक्रोश के साथ पूछा कि पुलिस वालों ने सुरक्षा का भरोसा देकर ही हिमांशु को अपनी वैन में बैठाया था, फिर उनकी आंखों के सामने चपड़ और चाकुओं से हमला कैसे होने दिया गया?

हमलावरों ने हिमांशु को मरणआसन्न कर दिया और पुलिस तमाशबीन बनी रही। पीड़ित पिता का यह आरोप कि ‘इस कांड में पुलिस वालों की भी संलिप्तता है’, पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है।

विश्वनाथ मंदिर के सामने पसरा सन्नाटा और सुलगते सवाल

​मंगलवार को गुरुद्वारा रोड पर एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने आने वाले श्रद्धालुओं के चेहरे पर खौफ और गुस्सा साफ देखा जा सकता था। हर जुबान पर एक ही सवाल था:

  • ​जब अपराधियों ने हमला किया, तब पुलिस वाले क्या कर रहे थे?
  • ​उनके पास मौजूद अत्याधुनिक हथियार क्या सिर्फ नुमाइश के लिए थे?
  • ​हमलावरों को खदेड़ने या उन पर जवाबी कार्रवाई करने की हिम्मत पुलिस ने क्यों नहीं दिखाई?
  • ​हमले के बाद लहूलुहान युवक को सड़क पर तड़पने के लिए क्यों छोड़ दिया गया और अपराधियों को भागने का रास्ता किसने दिया?

इंसाफ की लंबी राह और ‘रिचा’ का अंधकारमय भविष्य

​मोहल्ले में इकट्ठा हुए लोगों का दर्द और गुस्सा प्रशासन के खिलाफ फूट रहा था। लोग बेबसी से कह रहे थे, "जांच तो पुलिस करती रहेगी, फाइलें आगे बढ़ती रहेंगी। अपराधियों को सजा मिलने की कानूनी प्रक्रिया तो वर्षों-वर्षों तक कोर्ट में खिंचती चली जाएगी। लेकिन उस मासूम रिचा का क्या होगा, जिसके जीवन के सारे अरमान टूट चुके हैं?"

​लोगों के दिलों में व्यवस्था के प्रति इतनी कड़वाहट और निराशा भर चुकी है कि अब वे त्वरित न्याय की मांग कर रहे हैं।

मोहल्ले में चर्चा थी कि यदि ऐसे जघन्य अपराधियों के एनकाउंटर की मांग की जा रही है, तो इसमें गलत क्या है?

जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं या मूकदर्शक बन जाएं, तो समाज का आक्रोश इसी रूप में फूटता है।

​सवाल बेहद तीखे हैं और सीधे पुलिस प्रशासन के इकबाल पर निशाना साध रहे हैं।

मगर अफसोस, इन सुलगते सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं है। चारों तरफ सिर्फ निराशा का भाव है।

आज सबसे बड़ी चिंता रिचा के भविष्य को लेकर है, जो हर किसी के दिल-ओ-दिमाग पर साफ देखी जा सकती है।

गुरुद्वारा रोड का यह खौफनाक सन्नाटा मानो चीख-चीखकर पूछ रहा है कि आखिर इस बेटी के उजड़े सुहाग का हिसाब कौन देगा? क्या खाकी सिर्फ तमाशा देखने के लिए है?

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