पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने उठाया धर्मांतरण का मुद्दा, बिरसा मुंडा के जीवन प्रसंगों का किया उल्लेख

==आदिवासी समाज में मिशनरियों की भूमिका पर जताई चिंता

==कहा- बिरसा मुंडा ने मिशनरी प्रभाव का विरोध कर स्वाभिमान का रास्ता चुना

जमशेदपुर: पूर्व सांसद Shailendra Mahato ने सोशल मीडिया मंच फेसबुक पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर झारखंड में धर्मांतरण, ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों और भगवान Birsa Munda के जीवन से जुड़े प्रसंगों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

अपनी पोस्ट में उन्होंने दावा किया है कि अंग्रेजी शासन के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरियों द्वारा व्यापक स्तर पर धर्म प्रचार और धर्मांतरण का अभियान चलाया गया।
महतो ने लिखा कि ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद विदेशी ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां तेज हुईं। उनके अनुसार वर्ष 1844 में जर्मनी से आए मिशनरियों ने कोलकाता से अपना कार्य प्रारंभ किया, लेकिन बाद में रांची और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों को केंद्र बनाकर काम किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज की गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक चुनौतियों का लाभ उठाकर धर्मांतरण को बढ़ावा दिया गया।
फेसबुक पोस्ट में पूर्व सांसद ने यह भी कहा कि मिशनरियों ने आदिवासी समाज को उसकी पारंपरिक सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया के तहत धर्मांतरित समुदाय को एक अलग सामाजिक पहचान देने की कोशिश की गई।

बिरसा मुंडा के जीवन का किया उल्लेख
अपने पोस्ट में शैलेंद्र महतो ने भगवान बिरसा मुंडा के छात्र जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे चाईबासा के मिशन स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आए थे। उन्होंने लिखा कि मिशनरी विचारों से असहमति के बाद बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म का त्याग कर दिया और बाद में आनंद पाण के संपर्क में आकर धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों से जुड़े।
महतो के अनुसार, इसी दौर में बिरसा मुंडा ने लोगों को संगठित करना शुरू किया और आगे चलकर अंग्रेजी शासन तथा शोषण के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व किया। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा आदिवासी स्वाभिमान, सांस्कृतिक पहचान और स्वतंत्रता चेतना के प्रतीक बनकर उभरे।

सोशल मीडिया पर छिड़ी चर्चा
पूर्व सांसद की इस फेसबुक पोस्ट के बाद धर्मांतरण, आदिवासी अस्मिता और बिरसा मुंडा के विचारों को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, पोस्ट में व्यक्त विचार शैलेंद्र महतो के निजी मत हैं और इतिहासकारों तथा विभिन्न सामाजिक-धार्मिक समूहों के इस विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण भी मौजूद हैं।


(यह समाचार पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो द्वारा फेसबुक पर साझा किए गए विचारों पर आधारित है।)

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