August 28, 2026
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बाबूलाल पेंटर: जिन्होंने कबाड़ से बना डाला पहला स्वदेशी फिल्म कैमरा, भारतीय सिनेमा को दी नई दिशा

बाबूलाल पेंटर: जिन्होंने कबाड़ से बना डाला पहला स्वदेशी फिल्म कैमरा, भारतीय सिनेमा को दी नई दिशा

नई दिल्ली, 2 जून (आईएएनएस)। बाबूराव पेंटर का जन्म 3 जून 1890 को कोल्हापुर के एक पारंपरिक शिल्पकार (मेस्त्री) परिवार में हुआ था। घर में ही बढ़ईगिरी, लोहारी, नक्काशी और चित्रकला का ऐसा माहौल था कि उन्होंने बिना किसी औपचारिक स्कूल या आर्ट कॉलेज के ही कला और विज्ञान के बीच की कड़ियों को जोड़ना सीख लिया था।

जब कैमरे की तकनीक के लिए विदेशी दरवाजे बंद हो गए, तो बाबूराव ने स्वावलंबन का मार्ग चुना। अपने परम शिष्य वी. जी. दामले और बढ़ई मित्र ज्ञानबा सुतार के साथ मिलकर उन्होंने कोल्हापुर में एक साधारण खराद मशीन पर दो वर्षों तक कड़ा संघर्ष किया।

उन्होंने कबाड़ बाजार से एक पुराना प्रोजेक्टर खरीदा। उसके चक्रों और गियर प्रणालियों का बारीकी से अध्ययन कर, वर्ष 1918 में उन्होंने भारत का पहला स्वदेशी ‘मोशन पिक्चर कैमरा’ बनाकर दुनिया को चौंका दिया। यह कैमरा एक सेकंड में 16 बार लेंस को खोल और बंद कर सकता था। इस स्वदेशी कैमरे की पहली परीक्षा रंकाला तालाब में तैरते बच्चों और पंचगंगा नदी के घाट पर कपड़े धोती महिलाओं के दृश्यों को रिकॉर्ड करके ली गई थी। इस अभूतपूर्व सफलता के बाद ही 1 दिसंबर 1918 को ‘महाराष्ट्र फिल्म कंपनी’ की नींव पड़ी।

कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज के प्रगतिशील विचारों ने बाबूराव को बहुत प्रभावित किया। महाराज ने मेस्त्री भाइयों को सिनेमाई प्रयोगों के लिए केवल भूमि ही नहीं दी, बल्कि बिजली का जनरेटर और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध कराईं।

सिनेमा के पर्दे पर उस दौर में पुरुष ही महिलाओं का किरदार निभाते थे। बाबूराव ने इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ा।

बाबूराव पेंटर केवल एक फिल्म निर्देशक या मैकेनिक नहीं थे। वे भारतीय सिनेमा के पहले विजुअल आर्टिस्ट थे। उन्होंने फिल्म उद्योग को पहली बार ‘स्टोरीबोर्डिंग’ (स्टेनोग्राफिक पद्धति) से परिचित कराया। वे शूटिंग से पहले ही हर शॉट का स्केच बना लेते थे, ताकि कच्चे फिल्म रोल की बर्बादी न हो। बाद में विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार सर्गेई आइंस्टीन ने भी उनकी इस तकनीक की प्रशंसा की थी।

वर्ष 1921-22 के दौरान वे दर्शकों को आकर्षित करने के लिए बहुपृष्ठीय ‘कार्यक्रम पुस्तिकाएं’ (प्रोग्राम बुकलेट्स) बांटने वाले पहले निर्माता बने। वर्ष 1924 में आई फिल्म ‘कल्याण खजिना’ के लिए उनके द्वारा तैयार किया गया पोस्टर आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे पुराना जीवित चित्र-पोस्टर माना जाता है।

बाबूराव पेंटर का स्टूडियो भारतीय सिनेमा की पहली व्यावहारिक एकेडमी था, जिसने वी. शांतराम, एस. फत्तेलाल और भालजी पेंढारकर जैसे 500 से अधिक दिग्गजों को तराशा।

उनके शिष्यों ने 1 जून 1929 को ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ की नींव रखी। इसके बाद 1931 में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी पर ताला लग गया। हालांकि बाद में उन्होंने वी. शांतराम के आग्रह पर बेहद लोकप्रिय सवाक फिल्म ‘लोकशाहीर रामजोशी’ (1947) का निर्देशन किया, लेकिन उनका मन मुख्य रूप से चित्रकला और मूर्तिकला के अपने शांत संसार में ही रमा रहा।

16 जनवरी 1954 को कला का यह सच्चा चितेरा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में विलीन हो गया, पर उनका स्वदेशी स्वाभिमान आज भी भारतीय सिनेमा के कैमरे में कैद है।

वीकेयूवीसी

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