जमशेदपुर में कुड़मी आंदोलन के खिलाफ आदिवासियों ने निकाली जनाक्रोश महारैली, उमड़ा जनसैलाब

जिले भर से पारंपरिक हथियारों के साथ समाहरणालय पहुंचे लोग, प्रदर्शन कर जताया विरोध

तीन घंटे प्रदर्शनकारी जिला समाहरणालय के सामने बैठे रहे, उपायुक्त ने कार्यालय से बाहर आकर लिया ज्ञापन

जमशेदपुर : कुड़मी आंदोलन के खिलाफ गुरुवार को पूर्वी सिंहभूम जिले के आदिवासियों ने जनाक्रोश महारैली निकाली। इसमें पूरे जिले से लोग पारंपरिक हथियारों के साथ शामिल हुए। डीसी ऑफिस पर आदिवासियों ने कुड़मियों की एसटी में शामिल करने की मांग पर विरोध जताया और इसे आदिवासियों के हक अधिकार पर हमला करार दिया।

करीब तीन घंटे आदिवासी प्रदर्शनकारी उपायुक्त कार्यालय के समक्ष सड़क पर बैठ प्रदर्शन करते रहे। अंत में उपायुक्त ने खुद कार्यालय से बाहर आकर प्रदर्शनकारियों से ज्ञापन लिया और प्रदर्शन समाप्त कराया। महारैली दोपहर करीब दो बजे उपायुक्त कार्यालय पहुंची। यहां पहुंचते ही आदिवासी समाज के लोग कार्यालय गेट के सामने सड़क पर बैठ गए। इस दौरान जय सरना, जय आदिवासी के नारे लगाए गए। इसमें जमशेदपुर शहर के साथ ही बंगाल सीमा, ओडिशा सीमा के आदिवासी संगठन के लोग भी शामिल हुए। इससे पहले शहर के अलग-अलग इलाकों से महारैली निकाली गई। इसमें करनडीह, जुगसलाई, बिष्टूपुर और साकची से होते हुए आमबगान पैदल रैली करते हुए लोग पहुंचे। इसी तरह बिरसानगर, बारीडीह, एग्रिको व साकची से होते हुए भी लोग आमबगान पैदल रैली करते लोग पहुंचे। वहीं, बाबा तिलका माझी मैदान बालीगुमा, डिमना चौक, मानगो होते हुए भी लोग भीड़ की शक्ल में आमबगान पहुंचे। आमबगान मैदान में एकत्रित होकर लोग उपायुक्त कार्यालय पहुंचे। आदिवासी समाज ने केंद्र एवं राज्य सरकार को चेतावनी दी कि उनकी संस्कृति, पहचान और अधिकारों से समझौता नहीं किया जाए। आदिवासी नेताओं ने डीसी कार्यालय के बाहर भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि कुड़मी समाज को एसटी में शामिल करने की मांग सोची समझी साजिश है। यह आदिवासी अधिकारों पर सीधा हमला है। कुड़मी समाज से हमारी दुश्मनी नहीं है, लेकिन जब हमारी पहचान, रहन-सहन, पूजा पद्धति, भाषा और परंपरा अलग है तो उन्हें आदिवासी कैसे माना जा सकता है। जंगलों से हमारा रिश्ता है, हम पेड़-पत्थर को पूजते हैं, हमारी संस्कृति पर चोट बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

33 आदिवासी संगठन के हजारों लोग हुए शामिल

महारैली में आदिवासी, उरांव, हो, भूमिज, संथाल, मुंडा, बिरहोर, सबर, बेदिया, गोड़, खाडिया समेत सभी 33 आदिवासी समाज के सामाजिक संगठन पारंपरिक स्वसाशन व्यवस्था मानकी मुंडा संघ, मांझी परगना महाल ने एकजुट होकर हिस्सा लिया। इस दौरान समाज के लोगों ने भारत सरकार, राष्ट्रपति, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को उपायुक्त के माध्यम से ज्ञापन सौंपा। महारैली का नेतृत्व दुर्गा चरण मुर्मू, सुरा बिरुली, दिनकर कच्छप, राजेश, दीपक मांझी, राकेश उरांव, नन्दलाल पातर, डेमका सोय, रवि सवैया, मोहिन सिंह सरदार, उपेंद्र बानरा, ठाकुर कलुण्डिया, डीबार पुरती, जेवियर कुजूर, लालमोहन जामुदा, लालमोहन मुर्मू, सुनील मुर्मू, पिथो सांडिल, परशुराम कर्मा, सुखलाल बिरुली, सुकराम सामद, प्रेम सामड आदि ने किया।

कुड़मियों के दावों के खिलाफ पेश किए संवैधानिक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य

प्रदर्शन के दौरान डीसी कर्ण सत्यार्थी आदिवासी प्रदर्शनकारियों से बात करने ऑफिस के बाहर आए। यहां उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया और आश्वस्त किया कि आदिवासी समाज की मांगों को केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार तक पहुंचाया जाएगा। इस दौरान उन्हें ज्ञापन सौंपा गया। इसमें आदिवासियों की ओर से माझी परगना महाल ने कुड़मियों के दावों के खिलाफ संवैधानिक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य पेश किए।

शहर के कई इलाकों में लगा जाम

महारैली के दौरान शहर के तीन रूट करनडीह, डिमना चौक और बिरसानगर से आमबगान तक रैली निकाली गई। इससे बिष्टूपुर, मानगो और बारीडीह रूट पर घंटों जाम की स्थिति रही। बिष्टूपुर मेन रोड पर दोपहर 12.30 बजे से 1.30 बजे तक जाम लगा राजा। महारैली के कारण प्रदर्शनकारी सड़क पर थे और वाहन जाम में फंसे रहे। ऐसा ही हाल मानगो का भी रहा। रैली ने दोपहर तक पूरे शहर की यातायात व्यवस्था को चरमराकर रख दिया। मानगो से साकची तक सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। दोपहर 12 बजे से करीब 1.30 बजे तक मानगो क्षेत्र में स्थिति सबसे ज्यादा खराब रही। इस दौरान स्कूलों की छुट्टी का समय होने के कारण अभिभावकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। लोगों ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि इतने बड़े प्रदर्शन के बावजूद ट्रैफिक प्रबंधन के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए। साकची गोलचक्कर, पुराना एमजीएम अस्पताल चौक समेत कई प्रमुख मार्गों पर भी वाहनों की आवाजाही ठप रही। हालात बिगड़ते देख प्रशासन ने मानगो बस स्टैंड गोलचक्कर से डीसी ऑफिस जाने वाले मार्ग को कुछ समय के लिए बंद कर दिया।

सरना झंडा लिए पारंपरिक परिधान एवं पत्ते पहनकर पहुंचे आदिवासी

रैली में आदिवासी समाज के लोग सरना झंडा लिए पारंपरिक परिधान में पहुंचे। कई प्रदर्शनकारी सांकेतिक रूप से जल, जंगल और ज़मीन से जुड़ाव दिखाने के लिए पत्ते पहनकर प्रदर्शन में पहुंचे। ये प्रदर्शनकारी पूरे प्रदर्शन में लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे।

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