जमशेदपुर : आनंद मार्ग प्रचारक संघ पूर्वी सिंहभूम जिला से हजारों की संख्या में आनंदमार्गी पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला स्थित आनंद नगर में आयोजित तीन दिवसीय धर्म महासम्मेलन में भाग ले रहे हैं। आनंद पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित इस महासम्मेलन में “रिनासां यूनिवर्सल” मंच से “प्रदूषण और मानसिक स्वास्थ्य” विषय पर विशेष व्याख्यान दिया गया।
आनंद मार्ग प्रचारक संघ के पुरोधा प्रमुख आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने अपने संबोधन में कहा कि आज मानव सभ्यता दो बड़े संकटों—पर्यावरण प्रदूषण और मानसिक प्रदूषण—का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण केवल वायु, जल, भूमि और ध्वनि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा असर मनुष्य के मन, भावनाओं और आध्यात्मिक जीवन पर भी पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि आनंद मार्ग दर्शन प्रदूषण को व्यापक दृष्टिकोण से देखता है। लोभ, भय, क्रोध, घृणा, संकीर्णता, भोगवाद और स्वार्थपरता मानसिक प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। ऐसी मानसिकता व्यक्ति के विवेक और नैतिक मूल्यों को कमजोर करती है तथा समाज और प्रकृति के संतुलन को भी नष्ट करती है।
आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी यह साबित कर रहे हैं कि वायु एवं ध्वनि प्रदूषण तथा तनावपूर्ण वातावरण मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। दूषित वायु मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, अत्यधिक शोर मानसिक अशांति और अनिद्रा को बढ़ाता है, जबकि हिंसक और उत्तेजक दृश्य सामग्री मन की स्थिरता को नष्ट कर देती है।
उन्होंने सामाजिक प्रदूषण को भी गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि भ्रष्टाचार, हिंसा, अन्याय, शोषण और नैतिक पतन समाज में भय, असुरक्षा और अविश्वास का माहौल पैदा करते हैं। कई बार सामाजिक प्रदूषण भौतिक प्रदूषण से भी अधिक घातक सिद्ध होता है।
पुरोधा प्रमुख ने कहा कि बाहरी प्रदूषण का मूल कारण मानसिक प्रदूषण है। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, संसाधनों का अत्यधिक उपयोग और पर्यावरण विनाश मानव की लोभ-प्रधान मानसिकता का परिणाम है। उन्होंने श्री श्री आनंदमूर्ति के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल विज्ञान और तकनीक मानवता की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते, इसके लिए नैतिकता और चेतना के विकास की आवश्यकता है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए उन्होंने नियमित ध्यान-साधना, यम-नियम आधारित नैतिक जीवन, सात्त्विक शाकाहारी भोजन और निःस्वार्थ सेवा को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि साधना मन को संतुलित, एकाग्र और शांत बनाती है तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता प्रदान करती है।
नव्य-मानवतावाद (Neo-Humanism) की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि समस्त जीव-जगत परम चेतना की अभिव्यक्ति है। इसलिए प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि संरक्षण और सम्मान की अधिकारी है। पशु-पक्षियों, वृक्षों और संपूर्ण पर्यावरण के प्रति प्रेम एवं संवेदनशीलता विकसित करना ही वास्तविक पर्यावरणीय चेतना का आधार है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय संकटों के समाधान के लिए व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक सामाजिक परिवर्तन भी जरूरी है। स्वच्छ वायु और जल संरक्षण, ध्वनि प्रदूषण में कमी, नैतिक आर्थिक व्यवस्था, संतुलित शहरी विकास, मूल्यनिष्ठ शिक्षा, जैव विविधता संरक्षण तथा योग और ध्यान का व्यापक प्रचार समय की मांग है।
अपने संबोधन के अंत में आचार्य विश्वदेवानन्द अवधूत ने कहा कि प्रदूषित वातावरण मन को अशांत बनाता है और प्रदूषित मन पर्यावरण को नष्ट करता है। इसलिए स्थायी समाधान के लिए बाहरी पर्यावरण की शुद्धि के साथ मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि भी अनिवार्य है। ध्यान-साधना, नैतिक जीवन, निःस्वार्थ सेवा और नव्य-मानवतावादी दृष्टिकोण के माध्यम से ही स्वस्थ, संतुलित और शांतिपूर्ण समाज की स्थापना संभव है।
