शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखा पत्र, बागी सांसदों को अलग मान्यता न देने की मांग

नई दिल्ली, 17 जून (आईएएनएस)। शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) के सांसद अरविंद सावंत ने पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के निर्देश पर लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखा है। लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र के जरिए पार्टी के कुछ सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता दिए जाने अथवा किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय की संभावनाओं पर गंभीर आपत्ति जताई गई है।

शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे) के सांसद अरविंद सावंत ने पत्र में लिखा है, “असली शिवसेना का प्रतिनिधित्व करने का हमारा दावा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और यह पत्र उस दावे पर बिना किसी प्रतिकूल प्रभाव डाले लिखा जा रहा है। मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के चुनाव चिह्न पर चुने गए कुछ सांसद आपके कार्यालय से संपर्क कर रहे हैं या संपर्क करने पर विचार कर रहे हैं, ताकि उन्हें लोकसभा के भीतर एक अलग समूह के रूप में मान्यता मिल सके या वे किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय कर सकें। चूंकि ऐसी खबरें राजनीतिक दलों और विधायी दलों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक व्यवस्था से सीधे जुड़े मुद्दों को उठाती हैं, इसलिए मैं पार्टी का पक्ष रिकॉर्ड पर रखना और सम्मानपूर्वक यह अनुरोध करना आवश्यक समझता हूं कि ऐसे किसी भी दावे पर विचार न किया जाए।”

सांवत ने कहा, “शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) एक ही राजनीतिक दल है और कानून की नजर में भी यही स्थिति है। संसदीय दल का अस्तित्व पूरी तरह से राजनीतिक दल पर निर्भर है और यह उसी के एक अंग के रूप में काम करता है। संवैधानिक ढांचा सदन के भीतर एक ही राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले कई प्रतिस्पर्धी समूहों के अस्तित्व की परिकल्पना नहीं करता है। नतीजतन, संसद में केवल एक ही अधिकृत पार्टी नेतृत्व, एक ही मान्यता प्राप्त पार्टी व्हिप और एक ही मान्यता प्राप्त पार्टी संरचना हो सकती है, जो राजनीतिक दल और उसके सक्षम निकायों के अधिकार के तहत काम करती हो।”

इस मामले में कानूनी स्थिति को माननीय सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव और अन्य’ मामले में स्पष्ट रूप से समझाया है। यह फैसला कई ऐसे सिद्धांतों को साफ करता है जो इस मामले से सीधे जुड़े हैं।

पहला, राजनीतिक दल में “विभाजन” को पहले जो संवैधानिक मान्यता मिली हुई थी, वह अब खत्म हो गई है। संविधान (91 संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत दसवीं अनुसूची के पैरा 3 को हटाए जाने के बाद सदस्य अब अयोग्यता की कार्यवाही से बचने के लिए राजनीतिक दल के भीतर विभाजन के दावे का सहारा नहीं ले सकते। इसलिए, संवैधानिक ढांचा राजनीतिक दल के भीतर अलग गुट बनने को विधायिका में अलग अस्तित्व के लिए वैध आधार नहीं मानता है।

शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मांग की है कि पार्टी को सदन में उसके अधिकृत नेता और व्हिप के माध्यम से प्रतिनिधित्व करने वाली एक ही राजनीतिक पार्टी के रूप में मान्यता मिलती रहे। पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले किसी भी कथित गुट या अलग हुए समूह को कोई अलग मान्यता, दर्जा, विशेषाधिकार या सुविधा न दी जाए। यदि ऐसा कोई अनुरोध प्राप्त होता है, तो शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को आपके कार्यालय के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उस पर कोई निर्णय न लिया जाए। पार्टी कानून के तहत उपलब्ध अपने सभी अधिकारों को सुरक्षित रखती है, जिसमें दसवीं अनुसूची के प्रावधानों का उपयोग करने और ऊपर बताए गए संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत किसी भी आचरण के संबंध में आवश्यक उपाय करने का अधिकार शामिल है।

ओपीपीएम

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