20 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से पश्चिम बंगाल की तलाकशुदा मुस्लिम महिला को मिला न्याय

कोलकाता/नई दिल्ली: लगातार लगभग 20 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद पश्चिम बंगाल की रौशनारा बेगम को आखिरकार न्याय मिला। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपनी शादी के समय मायके वालों द्वारा दिए गए उपहार, नकद राशि और सोना वापस पाने की हकदार है। यह फैसला न केवल रौशनारा के व्यक्तिगत संघर्ष की जीत है, बल्कि सभी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक निर्णय भी माना जा रहा है। करीब 45 वर्ष की रौशनारा बताती हैं कि यह लड़ाई उनकी शादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। साल 2005 में उनकी शादी हुई, लेकिन कुछ ही महीनों में रिश्ता टूटने लगा।

देशभर के कई मुस्लिम संगठनों ने भी इस फैसले का स्वागत किया। जमायत-ए-इस्लामी हिंद के शरिया काउंसिल के राष्ट्रीय सचिव मौलाना रज़ीउल इस्लाम नदवी ने कहा कि इस्लाम में पति द्वारा पत्नी को दिए गए तोहफे वापस नहीं लिए जा सकते, और पत्नी को उसके मायके से मिले उपहारों पर भी पूर्ण अधिकार है।

अत्याचार और फिर तलाक

2005 के अंत तक दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और ससुराल से निकाले जाने जैसी घटनाएं सामने आने लगीं। वर्ष 2008 में वे मजबूरी में मायके लौट आईं। अंततः 2011 में उनका तलाक हो गया। रौशनारा के पिता ने शादी में 7 लाख रुपये नकद और सोने के जेवर दिए थे, लेकिन तलाक के बाद भी उन्हें वापस नहीं लौटाया गया। रौशनारा भावुक होकर कहती हैं कि सात लाख रुपये हमारे जैसे परिवार के लिए बहुत बड़ी रकम थी। निचली अदालतों ने कई बार उनके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन जनवरी 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने निर्णय पलटते हुए कहा कि उन्हें उपहार में दिया गया नकद और सोना वापस पाने का अधिकार नहीं है। इसके बाद रौशनारा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इन सालों में उन्होंने अपने जीवन को भी नए सिरे से संभाला। वे आज एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में अध्यापिका हैं, दो बेटों की मां हैं और दोबारा शादी कर चुकी हैं।

महिला के वकील ने बताया

उनके वकील सैयद मेहंदी इमाम बताते हैं कि यह केस व्यक्तिगत रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण था। अब तक इस बारे में कोई स्पष्ट फैसला नहीं था कि शादी में दुल्हन को दिए गए उपहार जो ससुराल वालों के पास रहते हैं, तलाक के बाद वापस किए जाने चाहिए या नहीं। यह एक ग्रे एरिया था। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस पर निर्णायक फैसला दिया जाए। कुछ लोगों को आशंका थी कि यह मामला धार्मिक विवाद का रूप ले सकता है, क्योंकि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़ा हुआ मुद्दा था। लेकिन 2 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने समानता और गरिमा को केंद्र में रखते हुए फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं के वास्तविक अनुभवों और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कानून की व्याख्या की जानी चाहिए।

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