उपायुक्त को बहाली संबंधी अनुपालन रिपोर्ट 10 जुलाई तक तथा वेतन भुगतान की रिपोर्ट 10 अगस्त 2026 तक हाई कोर्ट में शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करनी होगी
रांची : झारखंड के बोकारो में एक अजीबोगरीब मामला हुआ। एक संविदाकर्मी चपरासी को सिर्फ इसलिए नौकरी से निकाल दिया गया कि वह दफ्तर की चाय पत्ती और बिस्कुट लेकर घर चला गया था। इस मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।
अदालत ने बर्खास्तगी को असंवेदनशील और अत्यधिक कठोर कार्रवाई बताते हुए कर्मचारी को सेवा में बहाल करने तथा 50 प्रतिशत बकाया वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया है।
झारखंड हाई कोर्ट ने जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए), बोकारो में कार्यरत संविदाकर्मी चपरासी रंजीत कुमार हिमांशु को बड़ी राहत देते हुए उनकी बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया है।
चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने प्रशासन की कार्रवाई को असंवेदनशील बताते हुए कर्मचारी को तत्काल सेवा में बहाल करने और 50 प्रतिशत बकाया वेतन का भुगतान करने का निर्देश दिया।
17 वर्षों की सेवा के बाद हुई थी बर्खास्तगी
रंजीत कुमार हिमांशु की नियुक्ति 31 दिसंबर 2005 को डीआरडीए, बोकारो में संविदा के आधार पर चपरासी के पद पर हुई थी। करीब 17 वर्षों तक सेवा देने के बाद 16 मार्च 2022 को उन्हें उप विकास आयुक्त (डीडीसी) कार्यालय से कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
नोटिस में केवल इतना कहा गया कि कार्यालय की कुछ सामग्री गायब है और वह उनके घर ले जाई गई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सामग्री क्या थी। बाद में सामने आया कि मामला चाय-पत्ती और बिस्कुट से जुड़ा था।
बिना स्पष्ट कारण समाप्त कर दी गई सेवा
नोटिस के बाद मई 2022 में प्रशासन ने बिना विस्तृत कारण बताए रंजीत कुमार हिमांशु की सेवा समाप्त कर दी। उन्होंने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन एकलपीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने खंडपीठ में अपील दायर की, जहां उन्हें न्याय मिला।
हाई कोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई को बताया असंवेदनशील
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि अस्पष्ट और अधूरा कारण बताओ नोटिस जारी करना, बिना नोटिस दिए कार्रवाई करने के समान है। अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासन ने कर्मचारी के 17 वर्षों के बेदाग सेवा रिकॉर्ड और पूर्व अधिकारियों द्वारा की गई प्रशंसा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि यह मान भी लिया जाए कि कर्मचारी चाय-पत्ती और बिस्कुट अपने घर ले गया था, तब भी इतनी छोटी घटना के लिए सीधे नौकरी से निकाल देना पूरी तरह असंगत और अत्यधिक कठोर दंड है।
परिवार की स्थिति पर भी जताई चिंता
अदालत ने कहा कि रंजीत कुमार हिमांशु अपनी पत्नी, तीन बेटियों और एक छोटी बहन का पालन-पोषण इसी नौकरी के वेतन से करते थे। बर्खास्तगी के समय प्रशासन ने उनके पारिवारिक और मानवीय पक्ष पर कोई विचार नहीं किया।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक गरीब कर्मचारी चार वर्षों तक नौकरी से बाहर रहा और केवल इस आरोप के कारण उसका परिवार कठिन परिस्थितियों से गुजरा कि वह घर कुछ चाय और बिस्कुट लेकर गया था।
बहाली और 50 प्रतिशत बकाया वेतन का आदेश
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि रंजीत कुमार हिमांशु को 1 जुलाई तक सेवा में बहाल किया जाए। साथ ही 31 जुलाई 2026 तक उनके 50 प्रतिशत बकाया वेतन का भुगतान किया जाए। शेष 50 प्रतिशत वेतन की कटौती को अदालत ने उनकी कथित गलती के लिए पर्याप्त दंड माना।
इसके अलावा अदालत ने बोकारो के उपायुक्त और उप विकास आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से आदेश का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। उपायुक्त को बहाली संबंधी अनुपालन रिपोर्ट 10 जुलाई तक तथा वेतन भुगतान की रिपोर्ट 10 अगस्त 2026 तक हाई कोर्ट में शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करनी होगी।
