भरत भूषण तिवारी प्रकरण में सरकार का कदम स्वागतयोग्य, अब निष्पक्ष कार्रवाई की परीक्षा
बिहार के भोजपुर के शाहपुर के बिलौटी गांव में युवा सामाजिक कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ ने बिहार की राजनीति और प्रशासन, दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस घटना के बाद उठे सवालों ने सरकार पर भारी दबाव बना दिया। विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ गठबंधन के कई नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। ऐसे माहौल में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा न्यायिक आयोग के गठन की घोषणा सरकार की ओर से डैमेज कंट्रोल की महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होगी। यह आश्वासन पीड़ित परिवार के साथ-साथ निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कथित फर्जी मुठभेड़ के आरोप केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं होते। वे कानून के शासन, पुलिस की जवाबदेही और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
न्यायिक जांच का निर्णय स्वागत योग्य है। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब जांच समयबद्ध, निष्पक्ष और पूरी पारदर्शिता के साथ पूरी हो। जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के कठोर कार्रवाई होना भी उतना ही आवश्यक है।
भरत भूषण तिवारी प्रकरण अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह बिहार में कानून के राज, प्रशासनिक जवाबदेही और जनता के विश्वास की परीक्षा बन चुका है। सरकार के लिए यह अवसर भी है कि वह निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई के माध्यम से यह संदेश दे कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। यदि ऐसा होता है, तो न केवल पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद मजबूत होगी, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकार की साख भी और अधिक मजबूत होगी।

