==जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी, नदी-पहाड़ संरक्षण के लिए नए कानून की मांग तेज
==राजेंद्र सिंह ने कहा- माई कहकर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़
जमशेदपुर। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि पहले पहाड़ और नदियों को बचाने की सोच होनी चाहिए, उसके बाद विकास की दिशा तय की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान विकास मॉडल विनाशकारी साबित हो रहा है, जहां विकास तो तेजी से हो रहा है लेकिन प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की चिंता पीछे छूट गई है।
साकची स्थित मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में आयोजित राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने “सनातन विकास” की अवधारणा सामने रखी।
उन्होंने कहा कि विकास ऐसा होना चाहिए जो “चरैवेति-चरैवेति” के सिद्धांत पर आधारित हो और पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे। आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित छोड़ना हमारी जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन जरूरी है। आज सस्टेनेबल डेवलपमेंट की चर्चा हो रही है, लेकिन 2030 तक के लक्ष्य के बावजूद ठोस परिणाम दिखाई नहीं दे रहे।
ऐसे में “सनातन डेवलपमेंट” की सोच अधिक प्रभावी हो सकती है। उन्होंने सनातन का अर्थ “नित्य नूतन, चिर पुरातन” बताते हुए कहा कि विकास की धारा निरंतर चलती रहनी चाहिए और उसमें आवश्यक सुधार होते रहने चाहिए।
कानून हैं, लेकिन सही भावना से लागू नहीं होते
सरयू राय ने कहा कि पर्यावरण ही नहीं, सामान्य प्रशासनिक कानूनों की स्थिति भी चिंताजनक है।
कई कानून होने के बावजूद उनका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा और जहां लागू हो रहे हैं, वहां भी उनकी मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की बात करने वालों को विकास विरोधी बताना उचित नहीं है।
उनका उद्देश्य केवल इतना है कि विकास के दौरान समाज और प्रकृति पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
उन्होंने कहा कि नया कानून बनने से जनता को न्यायालय जाने और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का एक नया आधार मिलेगा।
माई कहकर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़ : राजेंद्र सिंह
सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि नदी और पहाड़ को केवल आर्थिक संसाधन मानना गलत सोच है। उन्होंने कहा कि “माई कहकर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़।”
उन्होंने कहा कि वर्तमान विकास मॉडल प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित है।
भारत सरकार जहां रेयर मैटेरियल निकालने की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं सम्मेलन में प्रस्तावित कानून प्रकृति संरक्षण को प्राथमिकता देता है।
उन्होंने लोगों से “जमशेदपुर घोषणा पत्र” को गांव-गांव और मोहल्लों तक पहुंचाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि केवल ड्राफ्ट तैयार करने से कानून नहीं बनेगा, बल्कि इसके लिए जनजागरण और सामाजिक माहौल तैयार करना होगा।
सोशल मीडिया और जनसंवाद से बनेगा माहौल
राजेंद्र सिंह ने कहा कि इस कानून के समर्थन में सोशल मीडिया, मीडिया, शिक्षण संस्थानों और जनप्रतिनिधियों के साथ व्यापक संवाद चलाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पंचायतों और गांवों तक जाकर लोगों को जागरूक करना होगा।
उन्होंने कहा कि जब तक भारत में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से विकास हुआ, तब तक देश समृद्ध रहा। आधुनिक विकास मॉडल ने पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के संतुलन को कमजोर कर दिया है।
“Changing Face of Saranda” पुस्तक का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान सरयू राय की नई अंग्रेजी पुस्तक Changing Face of Saranda का विमोचन किया गया। पुस्तक में सारंडा क्षेत्र में हुए परिवर्तनों का उल्लेख किया गया है।
साथ ही पर्यावरण विषयों पर आधारित 126 पृष्ठों की स्मारिका का भी लोकार्पण किया गया।
प्रो. अंशुमाली और प्रो. पीयूष कांत पांडेय को ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी
राष्ट्रीय नदी-पर्वत सम्मेलन के संरक्षक राजेंद्र सिंह ने प्रो. अंशुमाली और प्रो. पीयूष कांत पांडेय को प्रस्तावित कानून का अंतिम ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी।
दोनों विशेषज्ञ विभिन्न ड्राफ्टों का अध्ययन कर एक सप्ताह के भीतर संयुक्त मसौदा तैयार करेंगे।
जमशेदपुर घोषणा पत्र में 10 प्रमुख संकल्प
सम्मेलन के अंतिम दिन “जमशेदपुर घोषणा पत्र” जारी किया गया। इसमें पर्वतीय और नदी पारितंत्रों के संरक्षण, जल सुरक्षा, जैव विविधता और आदिवासी समुदायों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।
घोषणा पत्र में पर्वत संरक्षण के लिए समग्र कानूनी ढांचा तैयार करने, देशव्यापी परामर्श आयोजित करने तथा “पर्वत संरक्षण अधिनियम” लाने की मांग की गई।
कानून के ड्राफ्ट को लेकर आए प्रमुख सुझाव
कानून की भाषा सरल और आम लोगों की समझ में आने वाली हो
वैज्ञानिक संस्थानों को अधिक अधिकार दिए जाएं
नीति निर्धारकों की भूमिका मजबूत हो
वैध और अवैध खनन पर विस्तृत प्रावधान बनाए जाएं
ब्लास्टिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए
रिवर बेसिन प्रोटेक्शन को कानूनी संरक्षण मिले
पहाड़ की स्पष्ट और व्यापक परिभाषा तय की जाए





