झारखंड आंदोलन के पुरोधा सूर्य सिंह बेसरा के 50 वर्षों की स्वर्णगाथा : 12 दिसंबर को रांची में विशेष व्याख्यान माला

  • ASU की पहल पर होगा कार्यक्रम, कई विशिष्ट अतिथि होंगे शामिल, दिखेगा संघर्ष, नेतृत्व और साहित्यिक विरासत का संगम
  • अध्यक्षता करेंगे सुप्रसिद्ध साहित्य सेवी गोविंद अग्रवाल दोदराजका, मुख्य अतिथि रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ
  • पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो, और वरिष्ठ पत्रकार अनुज सिंह समेत समेत कई जानी-मानी हस्तियां होगी प्रमुख वक्ता

जमशेदपुर : झारखंड आंदोलन के निर्णायक नायक, समाज-संस्कृति और शिक्षा के प्रखर हस्ताक्षर , पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा के सार्वजनिक जीवन के 50 वर्ष (1975–2025) पूरे होने के उपलक्ष्य में आगामी 12 दिसंबर 2025 को रांची स्थित आर्यभट्ट सभागार (मोरहाबादी) में एक भव्य व्याख्यान माला का आयोजन किया जाएगा।
“शेखर से शिखर तक : संघर्ष के 50 वर्ष” शीर्षक से होने वाली यह विशेष श्रृंखला झारखंड निर्माण, आदिवासी अस्मिता, शिक्षा, साहित्य और जन-आंदोलन में उनके योगदान का व्यापक विश्लेषण करने वाली होगी।

शीर्ष हस्तियां होंगी शामिल

आयोजन की गरिमा इस बात से भी स्पष्ट है कि इसमें देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और आंदोलनकारियों को वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया है।

मुख्य अतिथि होंगे रक्षा राज्य मंत्री और रांची से लोकसभा सदस्य संजय सेठ, अध्यक्षता करेंगे जमशेदपुर निवासी प्रख्यात समाजसेवी, साहित्यसेवी और राष्ट्रीय कवि सम्मेलन की धारा को कोल्हान की धरा पर उतारने वाले, गोविंद प्रसाद अग्रवाल दोदराजका ।
संचालन का दायित्व झारखंड महिला आयोग की पूर्व सदस्य डॉक्टर वासवी किडो निभाएंगी। प्रारंभिक संबोधन निदेशक, जॉनस हॉपकिंस यूनिवर्सिटी सुश्री नीतिशा बेसरा का होगा।


कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता के रूप में पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो, AJSU के संस्थापक अध्यक्ष प्रभाकर तिर्की, वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा, साहित्यकार डॉ. वीरेंद्र नाथ पल्लव, नागपुरी शिक्षाविद डॉ. सविता केसरी, ‘झारखंड बचाओ अभियान’ के संजय बसु मलिक, मुसाबनी के भारत भास्कर के लेखक वीरेंद्र नाथ घोष, आदिवासी जन परिषद के अध्यक्ष प्रेम शाही मुंडा, लोक सेवा समिति रांची के अध्यक्ष मोहम्मद नौशाद, उत्तर प्रदेश के सोनांचल राज्य आंदोलन के प्रणेता रोशन लाल यादव, सीतानंद महाविद्यालय पश्चिम बंगाल के प्राचार्य डॉक्टर सामू महाली और कई अन्य अनेक गणमान्य व्यक्ति शामिल होंगे।
कार्यक्रम के संयोजक— सुबोध कुमार दांगी, अनिल कुमार भगत, रवि पीटर और बाबा लिंडा ने बताया कि यह आयोजन झारखंड आंदोलन के इतिहास और वर्तमान को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण मंच होगा।

आयोजक संस्था ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) है, जिसने झारखंड राज्य निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी

निर्णायक आंदोलनकारी के रूप में
इतिहास में दर्ज वह क्षण आज भी स्मरणीय है, जब 1991 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बयान—“मेरे जीवित रहते झारखंड नहीं बनेगा”— का प्रखर प्रतिवाद करते हुए सूर्य सिंह बेसरा ने पहली बार झारखंड राज्य दिवस मनाया और आंदोलन को नई दिशा दी।, उन्होंने तत्कालीन बिहार विधानसभा में घाटशिला क्षेत्र से विधायक के रूप में इस्तीफा देकर झारखंड राज्य आंदोलन को लेकर अपने निष्ठा और प्रतिबद्धता का भी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन किया

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालयों की स्थापना तक, AJSU के नेतृत्व में सूर्य सिंह बेसरा ने शिक्षा की मशाल को पूरे झारखंड में जलाया।

साहित्यिक पहचान : फाइटर से राइटर
संताली साहित्य में काव्य कृतियों
‘ गीतांजलि’ और ‘ मधुशाला’ के अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
उन्हें “झारखंड रत्न”, “संताली विश्व कवि” से लेकर “धरती सींग चंदो” जैसे अनेक विशिष्ट सम्मान प्राप्त हैं।

व्याख्यान माला से क्या उम्मीद?
सूर्य सिंह बेसरा के 5 दशक के सार्वजनिक सफरनामे को बिल्कुल नजदीक से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार चंद्रदेव सिंह राकेश का मानना है कि यह कार्यक्रम झारखंड की नई पीढ़ी को संघर्ष, नेतृत्व और सांस्कृतिक जागरूकता का संयमित संदेश देगा।
झारखंड आंदोलन, आदिवासी अधिकार, भाषा-संस्कृति, जल-जंगल-जमीन, स्वशासन और साहित्यिक धरोहर—इन सभी आयामों पर विचार होगा।

रांची से प्रकाशित दैनिक अखबार प्रातः नागपुरी के कार्यकारी संपादक शिवकुमार सिंह के अनुसार झारखंड राज्य निर्माण आंदोलन की धड़कनों में धड़कने वाली आवाज़ सूर्य सिंह बेसरा की ‘संघर्ष गाथा के 50 वर्ष’ न केवल अतीत की कहानी कहते है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा और प्रेरणा भी तय करते है।

जमशेदपुर आदित्यपुर निवासी जाने-माने राष्ट्रवादी चिंतक और समाजवादी पृष्ठभूमि के सामाजिक वैज्ञानिक रविंद्र नाथ चौबे का मानना है कि यह व्याख्यान माला झारखंड की अस्मिता, इतिहास और भविष्य—तीनों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगी।

वे कहते हैं कि यह आयोजन सिर्फ 50 वर्षों का उत्सव नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा—उसकी पहचान, संघर्ष और गौरव को समझने का अवसर है।

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