No anti-incumbency against Mamata : पश्चिम बंगाल में सभी पार्टियों पर SIR का असर, योजनाओं पर टिका भरोसा

मतदाताओं को आयुष्मान भारत योजना की कमी नहीं होती महसूस

स्वास्थ्य साथी योजना से भी हो रहा 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज

रोजगार के मुद्​दे पर है असंतोष, बंगाल के लोगों में नहीं है नाराजगी

कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच मतदाता सूची से नाम कटने, एंटी-इनकंबेंसी और रोजगार जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। हालांकि, सरकारी योजनाओं का लाभ पाने वाले मतदाताओं का रुझान भी चुनावी समीकरण को दिलचस्प बना रहा है।


पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार सामने आए हैं, जिनके किसी एक सदस्य का नाम मतदाता सूची से हट गया है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इससे बाकी मतदाताओं की नाराजगी किस दल पर असर डालती है।

राज्य में पिछले 15 वर्षों से Mamata Banerjee के नेतृत्व में सरकार है, इसलिए स्वाभाविक रूप से एंटी-इनकंबेंसी का असर महसूस किया जा रहा है। कई जगहों पर बदलाव की मांग सुनाई देती है। कुछ मतदाताओं ने राजनीतिक हिंसा और माहौल को लेकर चिंता जताई, जबकि रोजगार के सीमित अवसरों को लेकर भी असंतोष दिखा। हालांकि, यह नाराजगी व्यापक और तीखी नहीं दिखी।

जमीनी स्तर पर बड़ी संख्या में लोगों ने राज्य सरकार की योजनाओं का जिक्र किया। लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को हर महीने मिलने वाली आर्थिक सहायता का असर स्पष्ट नजर आता है। वहीं, स्वास्थ्य साथी योजना के जरिए लोगों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज मिल रहा है, जिससे वे संतुष्ट दिखे।

Bharatiya Janata Party भले ही आयुष्मान भारत योजना के राज्य में लागू न होने को मुद्दा बना रही है, लेकिन आम लोगों से बातचीत में इसकी कमी खास तौर पर महसूस नहीं हुई।

पहले चरण में हुई जोरदार वोटिंग के बाद चुनावी माहौल और भी रोचक हो गया है। एंटी-इनकंबेंसी, घुसपैठ, मतदाता सूची से नाम हटने और रोजगार जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का असर सभी दलों पर दिख रहा है। जहां All India Trinamool Congress इस प्रक्रिया को लेकर असहज है, वहीं बीजेपी भी पूरी तरह सहज नजर नहीं आ रही।

एंटी-इनकंबेंसी के बावजूद ममता बनर्जी के खिलाफ व्यापक नाराजगी नहीं दिखती और बीजेपी के पक्ष में भी कोई स्पष्ट लहर नहीं है। ऐसे में चुनाव परिणाम काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा दल अपने संगठन और बूथ स्तर के नेटवर्क को बेहतर तरीके से संभालता है।

इस मामले में तृणमूल कांग्रेस का बूथ लेवल मैनेजमेंट बीजेपी की तुलना में अधिक मजबूत माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि बीजेपी इस चुनौती से कैसे निपटती है और चुनावी रणनीति को किस तरह लागू करती है।

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