देश के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की घटना से जमशेदपुर मे भी आक्रोश, राष्ट्रपति को भेजा गया मांग पत्र

जमशेदपुर | सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई पर अधिवक्ता द्वारा न्यायालय कक्ष में जूता फेंकने की अभूतपूर्व घटना ने पूरे देश में आक्रोश की लहर फैला दी है। इसे भारतीय न्यायपालिका की गरिमा और संविधान के मूल मूल्यों पर हमला माना जा रहा है। घटना के विरोध में डॉ. अंबेडकर एसटी-एससी-ओबीसी एंड माइनॉरिटी वेलफेयर समिति ने जमशेदपुर में आक्रोश रैली निकालते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम एक विस्तृत मांग पत्र पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त कार्यालय के माध्यम से प्रेषित किया।

न्यायपालिका का अपमान, लोकतंत्र पर हमला
समिति ने अपने पत्र में इस घटना को सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला, साथ ही दलित-बौद्ध समुदाय के खिलाफ गहराई से आहत करने वाला कृत्य बताया है।
प्रतिनिधियों ने कहा कि यह हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे वंचित समाज और संविधान की आत्मा पर है।

तीन घटनाओं ने समाज को किया व्यथित
समिति द्वारा भेजे गए मांग पत्र में देशभर में हाल के दिनों में घटी तीन प्रमुख घटनाओं का जिक्र किया गया:

6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता राकेश किशोर द्वारा मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की घटना।
जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जनजाति वर्ग से आने वाले सांसद खोगेन मुर्मू पर भीड़ का हमला।
हरियाणा में आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार की संदिग्ध आत्महत्या, जिसमें डीजीपी और एक एसपी पर उत्पीड़न का आरोप।
जातिगत नफरत की बर्बर मिसाल
संस्था ने आरोप लगाया कि जिस समय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जैसे गरिमामयी पद पर दलित पृष्ठभूमि और बौद्ध धर्म के अनुयायी विराजमान हैं, उस समय न्यायपालिका में ही इस तरह की घटना होना संविधान विरोधी मानसिकता को उजागर करता है।

सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कार्रवाई की मांग

समिति ने मांग की कि घटना के बाद X (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर न्यायमूर्ति गवई के खिलाफ की गई अशोभनीय, अपमानजनक और जातिसूचक टिप्पणियों के लिए आईटी एक्ट और देशद्रोह की धाराओं के तहत कठोर कार्रवाई हो।

राष्ट्रपति से न्याय की अपील
मांग पत्र में महामहिम राष्ट्रपति से संविधान के दायरे में रहते हुए त्वरित और प्रभावी हस्तक्षेप की अपेक्षा की गई है।
संस्था ने लिखा है कि राष्ट्रपति स्वयं अनुसूचित जनजाति वर्ग से आती हैं और वंचित वर्गों की पीड़ा से भलीभांति परिचित हैं, ऐसे में उनकी संवेदनशीलता और नेतृत्व से इस मामले में सशक्त संदेश और ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है।

पक्षपातपूर्ण रवैये पर चिंता
समिति का यह भी कहना है कि आज भी न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था में वंचित वर्गों के प्रति भेदभाव स्पष्ट रूप से दिखता है, जिसे लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया गया है।
उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से वंचित वर्गों के प्रति पक्षपात रोकने, न्यायाधीशों की गरिमा की रक्षा करने और जातीय आधार पर घृणा फैलाने वालों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई की मांग की।

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