जमशेदपुर के वरिष्ठ समाजसेवी महेंद्र नारायण सिंह पंचतत्व में विलीन, नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई

जमशेदपुर: मानगो के प्रतिष्ठित व वरिष्ठ समाजसेवी और टाटा स्टील के पूर्व कर्मचारी महेंद्र नारायण सिंह (90 वर्ष) का  स्वर्णरेखा नदी तट पर पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

मुखाग्नि बड़े बेटे कमल ने दी। 

 इस दौरान परिजनों, शुभचिंतकों और शहर के गणमान्य लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। 

भूईयाडीह स्थित स्वर्णरेखा घाट पर जब उनकी पवित्र चिता को मुखाग्नि दी गई, तो वहां मौजूद हर शख्स भावुक हो उठा।

​बता दें कि मानगो के पंचवटी कॉलोनी निवासी महेंद्र नारायण सिंह का रविवार देर शाम निधन हो गया था। 

 उनकी अंतिम यात्रा पूरी भव्यता के साथ निकाली गई, जिसमें परंपरा के अनुसार बैंड-बाजे के साथ उन्हें विदाई दी गई।

​अंतिम संस्कार में उमड़ा जनसैलाब, पैतृक गांव से भी पहुंचे लोग

महेंद्र नारायण सिंह के अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बिहार के भोजपुर जिले में स्थित उनके पैतृक गांव श्रीपालपुर से भी बड़ी संख्या में सगे-संबंधी और परिजन जमशेदपुर पहुंचे थे।

अंतिम यात्रा और घाट पर मुख्य रूप से कमल कुमार सिंह, बिमल कुमार सिंह, निर्मल सिंह, सतीश चंद्र, यू.पी. सिंह, अरबिंद सिंह, गोरख सिंह, चंद्रदेव सिंह  राकेश और आलोक कुमार समेत कई संबंधी और गणमान्य लोग उपस्थित थे।

इसके अलावा उनकी पुत्री इंदु सिंह, पिंकी कुमार, सुनीता सिंह, अनु सिंह, मीरा सिंह, केके सिंह और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

उनका पोता अभिजीत व उसकी पत्नी पाखी और दूसरा पोता पीयूष कुमार भी अंतिम यात्रा में शामिल हुए

​टाटा स्टील में निभाई 39 वर्षों तक सेवा

बिहार के भोजपुर जिले के श्रीपालपुर गांव में जन्मे महेंद्र नारायण सिंह रोजगार की तलाश में जमशेदपुर आए थे। 

21 जनवरी 1960 को उन्होंने टाटा स्टील में अपनी सेवा शुरू की थी। लगभग 39 वर्षों तक कंपनी में विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को निभाने के बाद, वर्ष 1999 में वे सेवानिवृत्त (Retire) हुए थे।

​सादगी और समाजसेवा के लिए हमेशा याद किए जाएंगे

टाटा स्टील से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन समाजसेवा के लिए समर्पित कर दिया।

वे मानगो क्षेत्र की सामाजिक गतिविधियों में बेहद सक्रिय रहे। इसके साथ ही वे क्षत्रिय समाज की मानगो इकाई और हाथी घोड़ा मंदिर समिति के कार्यों में भी बढ़-चढ़कर योगदान देते थे।

एक परिजन ने कहा कि लोगों की मदद करना ही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। वे जरूरतमंदों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

अपने मिलनसार व्यवहार, संवेदनशीलता और कर्मशीलता के कारण उन्होंने समाज में एक विशेष सम्मान हासिल किया था।

स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी सादगी, सेवा भावना और समाज के प्रति उनके योगदान को लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

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