कल के लेख में हमने मिशनरी सीएफ एंड्रूज़ की बात की कि कैसे उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ईसाई शिक्षा का प्रचार करना है। इस लेख में हम बात करेंगे मिशनरी डफ की, जिसकी चर्चा बार बार सी एफ एंड्रूज़ ने अपनी पुस्तक में की है। एलेग्जेंडर डफ का आगमन भारत में 1830 में हुआ था। एलेग्जेंडर डफ भी एलेग्जेडर की तरह भारत विजय का सपना लेकर आया था।
मगर जहाँ सदियों पहले एलेग्जेंडर अर्थात सिकंदर का सपना भारत आकर चूर चूर हो गया था तो वहीं डफ ने जो रणनीति बनाई थी, उसी रणनीति से प्रशिक्षित लोग इन दिनों भारत के इतिहास को अपमानित कर रहे हैं। एलेग्जेंडर डफ का सपना भारत को नष्ट करना नहीं था, बल्कि हिन्दू धर्म को नष्ट करना था। उसका उद्देश्य था कि वह हिन्दू धर्म के दुर्ग को उसके नीचे खान बनाकर अंग्रेजी माध्यम से ईसाई पढाई देकर विस्फोट कर दे, नष्ट कर दे!
विलियम पैटन द्वारा लिखी गयी पुस्तक ALEXANDER BUFF pioneer of MISSIONARY EDUCATION में लिखा है कि जब डफ भारत में आया तो उसने देखा कि पहले से मिशनरी अपने काम में लगी हुईं थीं, मगर वह अपना नाम इन सबमे शामिल नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने नया रास्ता चुना। डफ का मानना था कि उसने hinduism अर्थात हिन्दू धर्म को कमजोर और अंत में नष्ट करने का एक रास्ता देख लिया है। उसने कहा कि वह चाहता है कि एक ऐसी खान या सुरंग बनी जाए जो एक दिन हिन्दू धर्म के दुर्ग को नीचे से ही विस्फोट में उड़ा दे!”

अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्या हो सकता था? क्योंकि यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कम्पनी का कहीं न कहीं भारत में शासन स्थापित हो चुका था, मगर विद्रोह और विरोध के स्वर उभर ही रहे थे।
ऐसे में वह कौन सा मार्ग था जिस पर चलकर विरोध की धार को कुंद किया जा सकता था? ऐसा क्या था कि हिन्दू धर्म को नष्ट किया जा सकता था? डफ को पता चल चुका होगा कि हिन्दू समाज एक शिक्षित एवं सुसंस्कृत समाज है। उसमे ज्ञान का भण्डार है उसमें बोध का विस्तार है। तो ऐसे में क्या किया जाए कि हिन्दू धर्म ही नष्ट जो जाए!
परन्तु किसी भी धर्म को ऐसे ही तो नष्ट नहीं किया जा सकता। संस्कृति के रूप में उसकी जड़ें होती हैं, शिक्षा एक रूप में उसका विस्तार होता है, भाषा उसकी नींव होती है। तो क्या जड़, विस्तार और नींव सभी पर हमला एक साथ किया जाना था? और क्या वह एक दिन की परियोजना थी? नहीं! डफ को पता था कि यह होना इतना आसान नहीं है। इसलिए उसने षड्यंत्र रचा।
जैसे हमने एंड्रूज़ वाले लेख में देखा कि कैसे एंड्रूज़ का मानना था कि कला, संगीत और साहित्य को ईसाई बनाकर हिन्दू धर्म को नष्ट किया जा सकता है तो वहीं, डफ ने पहली बार यह कहा कि अंग्रेजी भाषा से हिन्दू धर्म को नष्ट किया जा सकता है क्योंकि यह अंग्रेजी भाषा ही है जो ईसाई रिलिजन का प्रचार प्रसार करेगी।
तो डफ की योजना क्या थी?
डफ की योजना यह थी कि ईसाई शिक्षा का प्रयोग करेंगे, जो बड़ी कक्षाओं तक जाएगी और इस शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा होगी जो हिन्दू धर्म का बहुत बड़ा अपमान एवं ईसाइयत की प्रस्तुति होगी। इस नीति में एक नहीं दो महत्वपूर्ण निर्णय थे। पहला तो उच्च शिक्षा को मिशनरी उपकरण बनाया जाए और दूसरा यह कि इसे अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही दिया जाए।

इस पुस्तक में लिखा है कि ईसाई शिक्षा से अर्थ था कि यह बहुत ही स्पष्ट और निश्चित हो कि व्यक्ति के व्यक्तित्व में वह सब झलक कर आए और उसमे रच बस जाए और उसके आदर्श वही हों जिनका वह पालन करता है, जिनकी वह रक्षा करता है। और जो भी वह पढ़े और लिखे, वह ईसाइयत शिक्षा के ही अनुसार हो।
ईसाई शिक्षा से डफ का अर्थ यही नहीं था कि केवल रिलीजियस शिक्षा दी जाए बल्कि उन्होंने यह कहा कि हर वह विषय जो ईसाई शिक्षा के दायरे के भीतर आता है और जो बाइबिल से सम्बंधित है और ईसाई मत की व्याख्या करता है!
वह ईसाई शिक्षा का प्रचार अंग्रेजी भाषा के माध्यम से इसलिए करना चाहता था क्योंकि उसे पता था कि वह हिन्दू धर्म को लड़कर नष्ट नहीं कर सकता। वह हिन्दू धर्म, उसके विश्वासों, उसके आदर्शों, और उसके सत्य को आम लोगों के दिमाग से नहीं मिटा सकता है। इसलिए उसने युवा मस्तिष्कों को प्रशिक्षित करना आरम्भ किया। उसने “आधुनिक ज्ञान” की चाह रखने वाले हिन्दू युवाओं को इतिहास और दर्शन, साहित्य और प्राकृतिक विज्ञान में प्रशिक्षित किया और इस माध्यम से वह हिन्दुओं के मस्तिष्क से हिन्दू धर्म का विचार ही मिट जाएगा और फिर उसका नष्ट होना मात्र समय पर निर्भर होगा।
मैकाले की प्रसिद्ध बैठक के मिनट्स में यह वर्णित है कि कैसे इस बात पर बहस हुई कि भारत में संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा में से कौन सी भाषा शिक्षा की होनी चाहिए तो कई लोगों ने संस्कृत, अरबी या फारसी कहा मगर डफ ने कहा कि यदि यूरोप के साथ चलना है तो अंग्रेजी को ही पढाई का माध्यम बनाया जाए!
डफ की बात को कई कथित भारतीयों ने समर्थन दिया और इस प्रकार अंग्रेजी को पढाई का माध्यम बनाया गया।
इस पुस्तक से यह बात पूरी तरह से स्पष्ट होती है कि भाषा को कैसे किसी धर्म और सभ्यता को नष्ट करने के लिए रणनीतिक रूप से प्रयोग किया जा सकता है। जैसे अंग्रेजी भाषा को बहुत ही सुनियोजित तरीके से संस्कृत के विरुद्ध प्रयोग किया गया और जो सबसे समृद्ध भाषा थी उसे बाजार से एकदम अलग कर दिया।
ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि संस्कृत ज्ञान के साथ साथ हिन्दुओं की भाषा थी, जो हिन्दुओं के ज्ञान का ही विस्तार पूरे विश्व में करती।
हालांकि अब स्थितियां कुछ बेहतर हुई हैं, परन्तु रह रह कर यह औपनिवेशिक गुलामी वाली मानसिकता कई लोगों के माध्यम से प्राप्त हो जाती है, जिनके लिए अंग्रेजी का आना ही शिक्षा और शिक्षित होने का पर्याय है एवं समस्त देशी भाषाएँ पिछड़ी हैं!
प्रश्न तो उठता है कि आखिर कब तक भाषा के आधार पर औपनिवेशिक गुलामी चलती रहेगी, जिसकी नींव डफ ने इस लक्ष्य के साथ डाली थी कि यही हिन्दू धर्म के दुर्ग को भीतर से खोखला करके विस्फोट में नष्ट करेगी!
(यह स्टोरी हिंदू पोस्ट की है और यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित की जा रही है.)
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