- –कोरोना काल में बंद हुए ठहराव अब तक बहाल नहीं, यात्रियों में बढ़ता आक्रोश
- –महामारी समाप्त हुए वर्षों बीत गए, मौन और मूकदर्शक है रेलवे प्रशासन
- –ट्रेन पकड़ने 15 से 20 किलोमीटर दूर टाटानगर या सीनी स्टेशन जाना पड़ता
गम्हरिया : रेलवे प्रशासन की मनमानी का खामियाजा कांड्रा स्टेशन के समीपवर्ती यात्रियों, छात्रों और मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। चक्रधरपुर रेल मंडल के अंतर्गत आने वाले कांड्रा स्टेशन पर कोरोना काल के दौरान बंद किए गए प्रमुख एक्सप्रेस ट्रेनों के ठहराव को पुनः शुरू करने की मांग अब तेज होती जा रही है।
स्थानीय यात्री, व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता दक्षिण पूर्व रेलवे के अधिकारियों से लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कांड्रा के यात्रियों को उनकी पुरानी सुविधाएं कब वापस मिलेंगी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान कई महत्वपूर्ण एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव कांड्रा स्टेशन पर बंद कर दिया गया था।
हालांकि महामारी समाप्त हुए वर्षों बीत चुके हैं और देशभर में रेल सेवाएं सामान्य हो चुकी हैं, लेकिन कांड्रा स्टेशन पर अब भी कई ट्रेनों का ठहराव बहाल नहीं किया गया है।
यात्रियों का आरोप है कि रेलवे की इस उदासीनता का खामियाजा मरीजों, बुजुर्गों, छात्रों और औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को भुगतना पड़ रहा है।
उन्हें ट्रेन पकड़ने के लिए 15 से 20 किलोमीटर दूर टाटानगर या सीनी स्टेशन जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त बर्बादी होती है।
स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि एक ओर रेलवे कांड्रा स्टेशन के आधुनिकीकरण और चौथी-पांचवीं रेल लाइन बिछाने जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यात्रियों की बुनियादी सुविधा माने जाने वाले ट्रेन ठहराव को बहाल नहीं किया जा रहा है।
उनका कहना है कि यदि स्टेशन के विस्तार पर भारी निवेश किया जा सकता है तो ट्रेनों को दो मिनट के लिए रोकने में प्रशासन को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
कांग्रेस के पूर्व जिला महासचिव एवं कार्यालय प्रभारी प्रकाश कुमार राजू ने कहा कि कांड्रा स्टेशन को सुदृढ़ बनाने और यात्री सुविधाओं की बहाली के लिए लंबे समय से संघर्ष किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि पूर्व में धरना-प्रदर्शन, रेल चक्का जाम और आमरण अनशन जैसे आंदोलनों के बाद दो ट्रेनों का ठहराव दोबारा शुरू कराया गया था, लेकिन अभी भी कई महत्वपूर्ण ट्रेनों का ठहराव बहाल होना बाकी है।
वहीं समाजसेवी डॉ. जोगेंद्र प्रसाद महतो ने इस मुद्दे को जनस्वास्थ्य और आर्थिक बोझ से जोड़ते हुए कहा कि ट्रेनों का ठहराव नहीं होने से सबसे अधिक परेशानी ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों और बुजुर्गों को होती है।
गंभीर स्थिति में इलाज के लिए बाहर जाने वाले मरीजों को कांड्रा की बजाय टाटानगर ले जाना पड़ता है, जो आपातकालीन परिस्थितियों में बेहद कठिन साबित होता है।
उन्होंने कहा कि जब कोरोना काल के बाद देश की अधिकांश व्यवस्थाएं सामान्य हो चुकी हैं, तो कांड्रा के यात्रियों पर यह ‘अघोषित प्रतिबंध’ अब भी क्यों लागू है।
स्थानीय नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि रेलवे प्रशासन जल्द कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लेता है तो क्षेत्र के सामाजिक संगठन और आम जनता संयुक्त रूप से बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे।
