जमशेदपुर औद्योगिक नगर के दर्जे को हाईकोर्ट में चुनौती

नागरिकों ने शहर को औद्योगिक क्षेत्र घोषित करने के सरकार के फैसले का विरोध किया

प्रमुख बिंदु:

• जमशेदपुर के 50 से अधिक निवासियों ने औद्योगिक नगर अधिसूचना के खिलाफ जनहित याचिका दायर की

• याचिकाकर्ताओं ने टाटा की भूमि पट्टे और राजस्व संग्रह की वैधता को चुनौती दी

• उच्च न्यायालय ने संबंधित मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के लंबित रहने तक सुनवाई स्थगित की

जमशेदपुर – झारखंड उच्च न्यायालय ने जमशेदपुर को औद्योगिक शहर घोषित करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी है।

सौरभ विष्णु के नेतृत्व में 50 से अधिक जमशेदपुर निवासियों ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है।

याचिका में राज्य सरकार की 23 दिसंबर, 2023 की अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें जमशेदपुर को औद्योगिक शहर घोषित किया गया है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कदम नागरिकों के स्वशासन के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

उनका दावा है कि इससे शहर पर टाटा कंपनी का औपनिवेशिक युग का नियंत्रण कायम रहेगा।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की हाईकोर्ट की खंडपीठ ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई की।

प्रस्तुत कानूनी तर्क

झारखंड के महाधिवक्ता ने सुनवाई के दौरान 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि यह जमशेदपुर को औद्योगिक शहर के रूप में नामित करने के सरकार के अधिकार का समर्थन करता है।

हालाँकि, याचिकाकर्ताओं के वकील अखिलेश श्रीवास्तव ने इस दावे का खंडन किया।

उन्होंने कहा कि 2018 का मामला वर्तमान औद्योगिक नगर अधिसूचना से संबंधित नहीं था।

श्रीवास्तव ने इस बात पर जोर दिया कि जमशेदपुर निवासी राज्य और टाटा के बीच किसी भी निजी समझौते के पक्षकार नहीं थे।

उन्होंने जोर देकर कहा, “नागरिकों को औद्योगिक शहर के नामकरण की वैधता को चुनौती देने का अधिकार है।”

भूमि एवं राजस्व विवाद

याचिका में भूमि अधिग्रहण और राजस्व संग्रहण के बारे में भी चिंता जताई गई है।

इसमें सरकार द्वारा दी गई 15,725 एकड़ भूमि पर टाटा के पट्टे की वैधता पर सवाल उठाया गया है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि टाटा ने गैर-आदिवासी व्यक्तियों को अवैध रूप से 12,708 एकड़ जमीन पट्टे पर दे दी है।

उनका दावा है कि कंपनी ने एक सदी तक अवैध रूप से भूमि राजस्व एकत्र किया है।

श्रीवास्तव ने बताया, “हम अदालत से अनुरोध करते हैं कि वह पट्टे को अवैध घोषित करे और टाटा को एकत्रित राजस्व सरकारी खजाने में जमा करने का आदेश दे।”

न्यायालय का निर्णय और भविष्य के निहितार्थ

अदालत ने मामले की जटिलताओं को स्वीकार किया।

इसमें कहा गया कि जमशेदपुर की भूमि पर नियंत्रण शहर के अंतिम कानूनी नामकरण पर निर्भर करेगा।

जवाहरलाल शर्मा द्वारा 2018 में दायर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले को देखते हुए, उच्च न्यायालय ने इसकी सुनवाई स्थगित करने का निर्णय लिया।

न्यायाधीशों ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद वर्तमान जनहित याचिका पर पुनः विचार करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट 20 सितंबर, 2024 को शर्मा के मामले की सुनवाई करेगा।

आलोचकों का तर्क है कि औद्योगिक शहर का दर्जा देने का उद्देश्य जमशेदपुर पर टाटा का ऐतिहासिक नियंत्रण बनाए रखना है।

उनका दावा है कि इससे टाटा की सुविधाओं का अनधिकृत विस्तार हुआ है और शहर का आधिकारिक क्षेत्र कम हो गया है।

याचिकाकर्ताओं ने राज्य और टाटा के बीच 20 अगस्त 2005 को हुए पट्टा समझौते में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का भी आरोप लगाया है।

उनका तर्क है कि नगर निगम को भूमि और राजस्व संग्रह पर अधिकार होना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं के एक करीबी सूत्र ने दावा किया, “टाटा ने अवैध रूप से ब्याज सहित लगभग लाखों करोड़ रुपये का भू-राजस्व एकत्र किया है।”

यह मामला जमशेदपुर में शासन के जटिल इतिहास को उजागर करता है।

औद्योगिक शहर के दर्जे के आलोचकों के अनुसार, जबकि अन्य भारतीय शहरों ने दशकों पहले नगर निगमों की स्थापना कर ली थी, जमशेदपुर का दर्जा अब भी विवादित है।

कानूनी विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस मामले का क्षेत्र में शहरी शासन और औद्योगिक नियंत्रण पर दूरगामी प्रभाव हो सकता है।

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