जमशेदपुर: दीपावली का त्यौहार कुछ ही दिनों में आने वाला है। लेकिन दूसरों के घरों को दीपावली के मौके पर प्रकाशित करनेवाले कुम्हारों की स्थिति सुधर नहीं रही है।
भारतीय परंपरा के तहत मिट्टी के दीप जलाकर अमावस्या की रात को उजाला किया जाता है।
शहर के कुम्हार भी दीपावली के पर्व के लिए मिट्टी के दिये और खिलौने बनाने में जुट गए हैं। हालाँकि कुम्हारों की कला अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।
नयी पीढ़ी के बच्चे इस कला में रुचि नहीं रखते, क्योंकि इसमें आमदनी लगातार घटती जा रही है।
लोग घरों को प्रकाशित करने के लिए बिजली के सामानों का ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं, और कुम्हारों के गढ़े दीप की मांग अब उतनी नहीं रही।
हाल के दिनों मे हो रही बारिश ने भी इन दिनों कुम्हारों को परेशान किया है।
धूप नहीं निकलने से मिट्टी के सामानो को सुखाने मे परेशानी होती है।
इसके बावजूद कुम्हार मेहनत करते नजर आ रहें हैं।
इनके द्वारा मिट्टी के दिये, खिलौने समेत दीपावली के कई मिट्टी के सामान कुम्हारों के द्वारा निर्माण किया जा रहा है।
कुम्हार बताते हैं कि आधुनिक लाइटों ने दीयों के प्रकाश को फीका कर दिया है।
इसके बाद भी, परम्परा को जीवित रखने हेतु वे इस पेशे का निर्वाहन कर रहें हैं।
यह अच्छी बात है कि हाल के दिनों में मिट्टी के दीपों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है। कई लोग यह समझने लगे हैं कि पर्व का अर्थ-तंत्र मजबूत रहना पर्वों के जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक पर्वों को नये जमाने में नये तरीके से मनाते हुए भी पारंपरिक अर्थ-तंत्र को कमजोर न होने देना पूरे समुदाय की जिम्मेवारी है।
वैसे, अब तक कुम्हारों के लिए इस पेशे में टिके रहने का कोई खास आकर्षण नहीं बन पाया है।

