August 28, 2026
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तेजस्वी रिजेक्ट, बिहार में जनता ने सपने बेचने वालों को दिखाया बाहर का रास्ता

तेजस्वी रिजेक्ट, बिहार में जनता ने सपने बेचने वालों को दिखाया बाहर का रास्ता

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव ने साफ कर दिया है कि 2025 के इस चुनाव न तो जाति की लड़ाई थी और न ही गठबंधन की। वास्तव में यह विश्वास की लड़ाई थी और मोदी-नीतीश की जोड़ी के लिए विश्वास की जीत हुई है। नतीजे जितने बड़े आए हैं, उतनी उम्मीद शायद खुद भाजपा नेतृत्व को भी नहीं थी। अमित शाह 160 सीटों की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन जनता ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को इससे भी बड़ी जीत सौंपी है।

तेजस्वी यादव को न पूरा यादव समाज का साथ मिला और न ही मुस्लिम मतदाता की गोलबंदी उनके पक्ष में दिखी। जनता के मन में एक ही डर गूंजता रहा कि कहीं बिहार दोबारा जंगलराज में न लौट जाए। लालू राज की परछाई तेजस्वी पर ऐसे चिपकी रही, जैसे बेताल विक्रम के कंधे पर। ऊपर से तेजस्वी का हर घर सरकारी नौकरी वाला चुनावी शिगूफा, जिसकी लागत बिहार के पूरे वार्षिक बजट से भी ज्यादा बैठती, वह सीधे मतदाताओं की समझदारी पर चोट कर गया। मतदाताओं को लगा कि यह वादा नहीं,मजाक है। कांग्रेस को बिहारियों ने इस बार भी गंभीरता से नहीं लिया। कई सीटों पर मुकाबला बनने से पहले ही कांग्रेस रेस से बाहर हो गई। महागठबंधन की नैय्या यहीं से डूबने लगी।

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र मानते हैं कि बिहारियों ने भावनाओं में नहीं, लाभ में वोट दिया। केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की योजनाओं का असर हर घर तक पहुंचा है। हर महीने मुफ्त राशन हो चाहे विधवा पेंशन, गरीबों को पक्का मकान (पीएम आवास योजना) हो या नई रेल गाड़ियां चलाना, नए हाईवे, नए मॉल और सबसे बड़ा कार्ड महिला रोजगार योजना के तहत खातों में सीधे 10-10 हजार रुपये डालना। बिहार में लगभग पांच करोड़ मतदाताओं में करीब सवा डेढ़ करोड़ महिलाएं हैं। महिलाओं के मत राजग के पक्ष में पड़े और उनके साथ पूरा परिवार भी उसी दिशा में गया और यही वोटों की सुनामी बन गई।

जात-पात का गणित ध्वस्त : इस बार किसी भी जाति ने अलग सुर में बात नहीं की। दलित, पिछड़ा, ओबीसी, अति-पिछड़ा और सवर्ण, सभी ने एकमत होकर ऐलान किया कि वे जाति को नहीं, चेहरे को और काम को देखेंगे। यह बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ है।

नीतीश का सुशासन मॉडल बना बैलेट का ब्रह्मास्त्र : नीतीश कुमार की शराबबंदी और गली-मोहल्लों में गुंडागर्दी पर लगाम का असर वोटों में साफ दिखाई दिया। अब लड़कियां और महिलाएं पटना की सड़कों पर रात में भी आराम से चाट-पकौड़े खा सकती हैं। यह नई पीढ़ी का जमीनी सुशासन है, जो शब्दों में नहीं, बल्कि अनुभव में मापा जाता है। यह जीत केवल सीटों की नहीं, एक मनोवैज्ञानिक जीत भी है। यह जीत बताती है कि उत्तर भारत के गरीब और मध्यम वर्ग के बीच नरेन्द्र मोदी की साख आज भी अटल है।

2025 का यह जनादेश ऐतिहासिक है। यह बिहारियों की परिपक्वता, उनकी समझ और भविष्य की उनकी प्राथमिकताओं का सटीक संदेश है। राजग को मिला यह विशाल जनसमर्थन बताता है कि बिहार अब पुरानी राजनीति नहीं चाहता। बिहार अब काम के नाम पर वोट देता है और बिहार ने इस बार दिल खोलकर फैसला दिया है।

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