नीतीश कुमार के व्यक्तित्व में ‘रीढ़’ का अभाव, यह राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि ‘वैचारिक आत्मर्पण’ है: शिवानंद तिवारी
- पूर्व मंत्री का तीखा हमला: बोले— चुनौतियों से डरकर रास्ता बदलना और अपनों की ही पीठ में छुरा घोंपना नीतीश की पुरानी फितरत
पटना : बिहार की राजनीति के दिग्गज और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ दशकों तक काम कर चुके पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी ने सोशल मीडिया के जरिए नीतीश कुमार पर अब तक का सबसे बड़ा वैचारिक हमला बोला है। तिवारी ने नीतीश कुमार के राजनीतिक चरित्र का विश्लेषण करते हुए उन्हें एक ऐसा नेता करार दिया है, जिसमें बड़े फैसले लेने और उन पर अडिग रहने की ‘हिम्मत’ और ‘रीढ़’ की कमी है।बड़े फैसलों में नहीं दिखी दृढ़ताशिवानंद तिवारी ने अपने बयान में कहा कि नीतीश कुमार कभी ऐसे नेता के रूप में स्थापित नहीं हो पाए, जो कठिन परिस्थितियों में मजबूती से खड़े रह सकें। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े निर्णयों के समय आवश्यक साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव दिखा है।अधूरे रह गए बड़े वादेतिवारी ने याद दिलाया कि सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने भूमि सुधार और सभी के लिए समान शिक्षा व्यवस्था लागू करने जैसे बड़े सामाजिक संकल्प लिए थे।उन्होंने कहा कि ये मुद्दे सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण एजेंडे थे, लेकिन राजनीतिक दृढ़ता के अभाव में ये योजनाएं फाइलों और समितियों तक सीमित रह गईं।समाजवादी विचारधारा से दूरी का आरोपउन्होंने कहा कि एक समय नीतीश कुमार पर महात्मा गांधी, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर की विचारधारा का प्रभाव दिखता था।वे “आरएसएस मुक्त भारत” जैसे मुद्दों पर मुखर रहते थे और भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकता बनाने की पहल भी करते थे।भाजपा से नजदीकी पर सवालतिवारी ने आरोप लगाया कि आज वही नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के साथ सत्ता में जाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, जिसे उन्होंने पहले कड़ा विरोध किया था। उनके अनुसार यह केवल राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि वैचारिक आत्मसमर्पण का संकेत है।पुराने सहयोगियों से रिश्तों पर भी टिप्पणीउन्होंने कहा कि जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ उनके साथ संबंधों में बदलाव आया।नेतृत्व शैली पर उठे सवालशिवानंद तिवारी ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि नीतीश कुमार के व्यक्तित्व में दृढ़ता की कमी है और वे टकराव से बचने की रणनीति अपनाते रहे हैं।बिहार की राजनीति में इस बयान के बाद सियासी हलचल तेज होने की संभावना है, वहीं जदयू की ओर से इस पर प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
