सरायकेला-चाकुलिया में चड़क पूजा की धूम : आस्था, परंपरा और कठिन तपस्या का अद्भुत संगम

सरायकेला / चाकुलिया : सरायकेला के भुरकुली गांव और चाकुलिया के सिमदी गांव में आयोजित चड़क पूजा एक बार फिर श्रद्धा, साहस और परंपरा का अनोखा उदाहरण बनकर सामने आई। जहां एक ओर भक्त कठिन तपस्या कर अपनी आस्था प्रकट करते दिखे, वहीं इस परंपरा को लेकर अंधविश्वास बनाम आस्था की बहस भी तेज हो गई है।

सरायकेला जिले के भुरकुली गांव में हर वर्ष आयोजित होने वाली चड़क पूजा इस बार भी पूरे विधि-विधान और भक्ति भाव के साथ संपन्न हुई। चैत्र मास में आयोजित इस परंपरा का समापन पाट संक्रांति के दिन होता है, जिसमें ‘भोक्ता’ कहलाने वाले श्रद्धालु अपने आराध्य के प्रति गहरी आस्था का प्रदर्शन करते हैं।

पूजा के दौरान श्रद्धालु अपने शरीर को कष्ट देकर साधना करते हैं। भक्त लोहे के कांटे शरीर में चुभाकर झूलते हैं, जीभ में छेद कर तपस्या करते हैं, जलते अंगारों पर चलते हैं और ऊंचाई से लटककर विभिन्न करतब दिखाते हैं। इन कठिन साधनाओं के बीच भी उनकी भक्ति और एकाग्रता देखने लायक होती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्ष 1908 में भुरकुली गांव में एक शिवलिंग के चमत्कारी रूप से प्रकट होने के बाद इस परंपरा की शुरुआत हुई थी। तब से ‘विश्वनाथ महादेव’ की पूजा के साथ यह आयोजन निरंतर जारी है। यह परंपरा अब न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी बन चुकी है।

वहीं पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया प्रखंड के सिमदी गांव स्थित सिमदेश्वर शिव मंदिर में भी मंगलवार को चड़क पूजा धूमधाम से आयोजित हुई। यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। भोक्ताओं ने जीभ और पीठ में कील घोंपकर भगवान शिव की आराधना की, जबकि कई श्रद्धालु 35 फीट ऊंचाई पर झूलते नजर आए।

भोक्ताओं ने मंदिर के पास स्थित तालाब में स्नान कर पूजा-अर्चना की। इसके बाद कई श्रद्धालु तपती दोपहरी में जमीन पर लोटते हुए और कांटों पर लेटकर मंदिर पहुंचे। मंदिर की परिक्रमा कर उन्होंने भगवान शिव की आराधना की। इस दौरान ‘जीभ फोड़’ और ‘रजनी फोड़’ जैसे पारंपरिक अनुष्ठान भी आयोजित किए गए।

विशेष रूप से भोक्ता गोपाल चंद्र नायक ने अपने शरीर में 151 आलपिन और मनोरंजन नायक ने 108 आलपिन चुभाकर पूजा की। इसके बाद कई श्रद्धालु पीठ में कील घोंपकर 35 फीट ऊंचाई पर झूले। आयोजन के दौरान चड़क पूजा कमेटी द्वारा प्रसाद वितरण भी किया गया।

इस अवसर पर कमेटी के संरक्षक कोकिल चंद्र महतो, भवतारण महतो, अध्यक्ष मनोज कुमार महतो, सचिव अनूप कुमार महतो, कोषाध्यक्ष धनंजय महतो सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

हालांकि इस परंपरा को लेकर सवाल भी उठते हैं कि शरीर को इस हद तक कष्ट देना कितना उचित है, लेकिन इन बहसों के बावजूद स्थानीय लोगों की आस्था अटूट बनी हुई है और वे इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।के भुरकुली गांव और चाकुलिया के सिमदी गांव में आयोजित चड़क पूजा एक बार फिर श्रद्धा, साहस और परंपरा का अनोखा उदाहरण बनकर सामने आई। जहां एक ओर भक्त कठिन तपस्या कर अपनी आस्था प्रकट करते दिखे, वहीं इस परंपरा को लेकर अंधविश्वास बनाम आस्था की बहस भी तेज हो गई है।

सरायकेला जिले के भुरकुली गांव में हर वर्ष आयोजित होने वाली चड़क पूजा इस बार भी पूरे विधि-विधान और भक्ति भाव के साथ संपन्न हुई। चैत्र मास में आयोजित इस परंपरा का समापन पाट संक्रांति के दिन होता है, जिसमें ‘भोक्ता’ कहलाने वाले श्रद्धालु अपने आराध्य के प्रति गहरी आस्था का प्रदर्शन करते हैं।

पूजा के दौरान श्रद्धालु अपने शरीर को कष्ट देकर साधना करते हैं। भक्त लोहे के कांटे शरीर में चुभाकर झूलते हैं, जीभ में छेद कर तपस्या करते हैं, जलते अंगारों पर चलते हैं और ऊंचाई से लटककर विभिन्न करतब दिखाते हैं। इन कठिन साधनाओं के बीच भी उनकी भक्ति और एकाग्रता देखने लायक होती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्ष 1908 में भुरकुली गांव में एक शिवलिंग के चमत्कारी रूप से प्रकट होने के बाद इस परंपरा की शुरुआत हुई थी। तब से ‘विश्वनाथ महादेव’ की पूजा के साथ यह आयोजन निरंतर जारी है। यह परंपरा अब न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी बन चुकी है।

वहीं पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया प्रखंड के सिमदी गांव स्थित सिमदेश्वर शिव मंदिर में भी मंगलवार को चड़क पूजा धूमधाम से आयोजित हुई। यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। भोक्ताओं ने जीभ और पीठ में कील घोंपकर भगवान शिव की आराधना की, जबकि कई श्रद्धालु 35 फीट ऊंचाई पर झूलते नजर आए।

भोक्ताओं ने मंदिर के पास स्थित तालाब में स्नान कर पूजा-अर्चना की। इसके बाद कई श्रद्धालु तपती दोपहरी में जमीन पर लोटते हुए और कांटों पर लेटकर मंदिर पहुंचे। मंदिर की परिक्रमा कर उन्होंने भगवान शिव की आराधना की। इस दौरान ‘जीभ फोड़’ और ‘रजनी फोड़’ जैसे पारंपरिक अनुष्ठान भी आयोजित किए गए।

विशेष रूप से भोक्ता गोपाल चंद्र नायक ने अपने शरीर में 151 आलपिन और मनोरंजन नायक ने 108 आलपिन चुभाकर पूजा की। इसके बाद कई श्रद्धालु पीठ में कील घोंपकर 35 फीट ऊंचाई पर झूले। आयोजन के दौरान चड़क पूजा कमेटी द्वारा प्रसाद वितरण भी किया गया।

इस अवसर पर कमेटी के संरक्षक कोकिल चंद्र महतो, भवतारण महतो, अध्यक्ष मनोज कुमार महतो, सचिव अनूप कुमार महतो, कोषाध्यक्ष धनंजय महतो सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

हालांकि इस परंपरा को लेकर सवाल भी उठते हैं कि शरीर को इस हद तक कष्ट देना कितना उचित है, लेकिन इन बहसों के बावजूद स्थानीय लोगों की आस्था अटूट बनी हुई है और वे इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।

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