सरायकेला में गूंजा छऊ का शंखनाद : मुखौटों के पीछे जीवित है सदियों पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत
सरायकेला : सरायकेला का राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र सोमवार को एक बार फिर पारंपरिक धुनों, नगाड़ों और कलाकारों की ऊर्जावान प्रस्तुतियों से जीवंत हो उठा। चैत्र पर्व के अवसर पर आयोजित ग्रामीण छऊ नृत्य प्रतियोगिता ने न केवल प्रतिभाओं को मंच दिया, बल्कि उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी सजीव किया, जिसने झारखंड को वैश्विक पहचान दिलाई है।
सरायकेला छऊ नृत्य की जड़ें कलिंग के गजपति शासन (1434–1541 ई.) तक जाती हैं। यह नृत्य शैली सरायकेला के राजघराने के संरक्षण में विकसित हुई। आधुनिक सरायकेला छऊ के जनक माने जाने वाले कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव (1896–1971) ने इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने पारंपरिक युद्ध कला ‘पारी-खंडा’ को शास्त्रीय नृत्य में ढालते हुए ‘चाली-उफली’ और नाट्यशास्त्र के तत्वों का समावेश किया।
1930 के दशक में इस नवाचार ने छऊ को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। वर्ष 1938 में सरायकेला के कलाकारों ने पहली बार यूरोप में प्रस्तुति देकर इसे वैश्विक मंच तक पहुंचाया। बाद में, 2010 में यूनेस्को द्वारा इसे ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल किया गया, जो इस कला की वैश्विक मान्यता का प्रमाण है।
संस्थागत योगदान और नई पहल
झारखंड सरकार द्वारा 1960 में स्थापित राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र, सरायकेला इस कला के संरक्षण और संवर्धन का प्रमुख केंद्र है। 1961 से सक्रिय इस संस्थान ने ग्रामीण प्रतिभाओं को मंच देने में अहम भूमिका निभाई है।
पूर्व निदेशक तपन पटनायक के प्रयासों से 1995 के बाद इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। उन्होंने अपनी ही परिजनों को प्रशिक्षण देकर इसकी शुरुआत की, जिसके बाद आज बड़ी संख्या में युवतियां और महिलाएं इस कला से जुड़ रही हैं। अपने लगभग 28 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने 2500 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया।
विशेषताएं और सांस्कृतिक महत्व
सरायकेला छऊ की सबसे अनूठी विशेषता इसके मुखौटे हैं, जो भावों को व्यक्त करने का प्रमुख माध्यम होते हैं। कलाकार अपनी आवाज़ का उपयोग नहीं करते, बल्कि शरीर की भंगिमाओं और रंग-बिरंगे मुखौटों के जरिए कथा प्रस्तुत करते हैं। देवताओं के लिए पीले और हरे, जबकि असुरों के लिए काले और नीले रंग के मुखौटे प्रयोग किए जाते हैं।

