कोल्हान में गरीबों के भगवान कहे जाने वाले जमशेदपुर के गंगा मेमोरियल हॉस्पिटल के संचालक डॉक्टर नागेंद्र सिंह नहीं रहे, सेवा के एक युग का अंत

चंद्रदेव सिंह राकेश
​जमशेदपुर
: मंगलवार की सुबह, झारखंड के सिंहभूम कोल्हान क्षेत्र पर शोक की काली छाया लेकर आई। जिसने भी यह हृदय विदारक खबर सुनी, उसकी आँखें नम हो गईं, और मन ने सहसा स्वीकार नहीं किया कि अब उनके “हर घर के डॉक्टर” और गरीबों के मसीहा, डॉ. नागेंद्र सिंह, इस दुनिया में नहीं रहे।

दिल्ली के अपोलो अस्पताल में, जीवन-मृत्यु के दो दिनों के संघर्ष के बाद, मानवता और सेवा की मिसाल माने जाने वाले डॉ. नागेंद्र सिंह ने अपनी अंतिम सांस ली।

उनका जाना सिर्फ एक चिकित्सक का चले जाना नहीं है, बल्कि उस अनमोल मानवीय परंपरा का अंत है, जिसे उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दिया था।

​ मसीहा का मौन: एक जीवन जो सेवा के लिए धड़का
​डॉ. नागेंद्र सिंह, जो मूल रूप से बिहार के दरभंगा जिले के निवासी थे, लेकिन जिनकी कर्मभूमि झारखंड का कोल्हान क्षेत्र रहा, अपने पीछे एक ऐसी अमिट विरासत छोड़ गए हैं, जिसे दशकों तक भुलाया नहीं जा सकेगा।

वह डॉक्टर कम, एक सामाजिक कार्यकर्ता ज़्यादा थे; एक व्यवसायी कम, एक सच्चा सेवक ज़्यादा।

​1990 के दशक में, जब आज की तरह स्वास्थ्य सुविधाओं का जाल ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं बिछा था, डॉ. सिंह ने पूर्वी सिंहभूम जिले के सुदूर बहरागोड़ा प्रखंड में एक सरकारी चिकित्सक के रूप में अपने पेशेवर सफर की शुरुआत की।

यह वह समय था जब ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा एक विलासिता थी। लेकिन डॉ. सिंह ने अपनी सेवा को विलासिता नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार माना।

​अगले दशकों तक, बहरागोड़ा से लेकर घाटशिला के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में, वह एक चिकित्सक नहीं, बल्कि एक अभिभावक की तरह स्थापित हो गए।

सीमित संसाधनों, टूटी सड़कों और अंधेरे रास्तों की परवाह किए बिना, उनका दरवाजा हर मरीज के लिए, हर वक्त खुला रहता था। चाहे आधी रात का बुख़ार हो, सांप का काटना हो, या कोई गंभीर दुर्घटना— डॉ. नागेंद्र सिंह हमेशा मौजूद रहते थे।

लोगों की भाषा में, वह केवल ‘डॉक्टर साहब’ नहीं थे, बल्कि ‘हर घर के डॉक्टर’ थे, जिन पर ग्रामीण आंख मूंदकर भरोसा करते थे।

यह विश्वास, उन्होंने केवल दवाइयों से नहीं, बल्कि अपने निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण से अर्जित किया था।

​ गंगा मेमोरियल: माँ की स्मृति में सेवा का मंदिर
​बीते कुछ वर्षों में, डॉ. सिंह ने अपनी सेवाओं का विस्तार करते हुए जमशेदपुर के मानगो क्षेत्र में डिमना रोड पर गंगा मेमोरियल हॉस्पिटल की स्थापना की।

यह अस्पताल महज़ एक व्यावसायिक उपक्रम नहीं था, बल्कि उनकी पूज्यनीय माता की स्मृति में स्थापित एक ‘सेवा का मंदिर’ था।

​डॉ. सिंह का उद्देश्य स्पष्ट था: “कोई भी गरीब इलाज के अभाव में जिंदगी न गंवाए।”

​इस दर्शन के साथ, गंगा मेमोरियल हॉस्पिटल वर्षों से कम शुल्क पर, बल्कि कई बार बिना किसी शुल्क के, गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराने का केंद्र बना रहा।

उन्होंने अस्पताल को एक ऐसा संस्थान बनाया, जहाँ मरीज़ की जेब नहीं, बल्कि उसकी ज़रूरत देखी जाती थी। यह बात हर उस व्यक्ति के हृदय में गहरे बसी है, जिसने कभी भी उनके अस्पताल की चौखट पर उम्मीद के साथ कदम रखा। उन्होंने चिकित्सा को लाभ कमाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन बचाने का धर्म समझा।

​ दिल्ली तक का सफर और उम्मीदों का टूटना
​जब दो दिन पूर्व उनकी तबीयत अचानक अत्यधिक बिगड़ी, तो पूरे जमशेदपुर, बहरागोड़ा और घाटशिला में एक तरह की बेचैनी छा गई।

स्वास्थ्य को बिगड़ता देख उन्हें तुरंत एयर एंबुलेंस द्वारा दिल्ली के अपोलो अस्पताल ले जाया गया। उम्मीद थी कि बड़े शहर की विशेषज्ञता उन्हें वापस ले आएगी।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा, हर संभव प्रयास किया गया, लेकिन कुदरत का फैसला कुछ और ही था।

​शनिवार सुबह, डॉ. सिंह ने अंतिम सांस ली, और इसी के साथ कोल्हान क्षेत्र की लाखों उम्मीदों ने दम तोड़ दिया।

यह ख़बर बिजली की तरह फैली और हर वर्ग में मातम छा गया— स्वास्थ्य जगत के सहकर्मी, सामाजिक संगठनों के सदस्य, और सबसे बढ़कर, उनके हजारों मरीज़ और ग्रामीण, जिनके लिए वह सचमुच में ‘भगवान’ की छवि रखते थे।

​स्थानीय सामाजिक संगठनों ने सही ही कहा है कि डॉ. नागेंद्र सिंह का जाना, सिर्फ एक चिकित्सक का चले जाना नहीं, बल्कि मानवता और सेवा की उस गौरवशाली परंपरा का अंत है, जिसे उन्होंने वर्षों तक जीवित रखा। यह क्षति अपूरणीय है।

​ शोक की लहर व अश्रुपूरित विदाई की तैयारी
​डॉ. सिंह के निधन पर जमशेदपुर, बहरागोड़ा और घाटशिला की सड़कों पर एक मौन छाया हुआ है। लोग सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत मुलाकातों तक, हर जगह उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। हर कोई उनके व्यक्तिगत त्याग, उनकी सरलता और उनके चेहरे पर हमेशा रहने वाली सौम्य मुस्कान को याद कर रहा है।

​एक ग्रामीण ने नम आँखों से कहा, “वे हमारे सुख-दुख के साथी थे। अब हमें इतनी कम फीस में, आधी रात को कौन देखेगा? गरीबों के भगवान मौन हो गए।”

​पारिवारिक सूत्रों ने बताया है कि पार्थिव शरीर को दिल्ली से जमशेदपुर लाने की तैयारी चल रही है। अब शहर और ग्रामीण क्षेत्र, दोनों ही अपने प्रिय सेवक की अंतिम विदाई की तैयारी में जुटे हैं।

​डॉ. नागेंद्र सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी सेवा की गाथा, उनकी निस्वार्थ भावना और गरीबों के लिए उनका अपार प्रेम हमेशा झारखंड की मिट्टी में जीवित रहेगा। उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण मानव सेवा को समर्पित किया और हमें यह सिखा गए कि सच्चा धन दौलत नहीं, बल्कि वह आशीर्वाद है जो एक मरते हुए इंसान की जान बचाने पर मिलता है।

​अलविदा, डॉ. साहब! आपकी विरासत हमेशा ज़िंदा रहेगी।

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