आदित्यपुर निवासी प्रसिद्ध ज्योतिषी डॉ रमेश उपाध्याय के पिता व बक्सर के जानेमाने कर्मकांडी पं. शिवशंकर उपाध्याय नहीं रहे, 88 वर्ष की उम्र में पंचतत्व में विलीन
==आदित्यपुर एनआईटी ईच्छापुर बस्ती के शिव सरस्वती सदन से निकली अंतिम यात्रा
==पार्वती घाट पर हुआ अंतिम संस्कार, समाज के विभिन्न वर्गों के सैकड़ो लोगों ने दी अंतिम विदाई
जमशेदपुर/ आदित्यपुर । प्रख्यात ज्योतिषाचार्य आचार्य डॉ. रमेश कुमार उपाध्याय शास्त्री के पूज्य पिता पंडित शिवशंकर उपाध्याय का निधन मंगलवार को 88 वर्ष की आयु में हृदयाघात से हो गया। वे अपने पीछे दो पुत्रों और पांच पुत्रियों समेत भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके एक पुत्र विदेश में रहते हैं जिनके आने पर अंतिम संस्कार किया गया।
उनका अंतिम संस्कार बुधवार को जमशेदपुर के पार्वती घाट (खरकई नदी तट) पर पूरे वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। इससे पहले अंतिम यात्रा उनके निवास स्थान ‘शिव सरस्वती सदन’, ईच्छापुर, आदित्यपुर-2 से निकली, जिसमें भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया। समाज के विभिन्न वर्गों की जानी-मानी हस्तियों, धर्माचार्यों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के गणमान्य लोगों ने उनकी अंतिम यात्रा में सम्मिलित होकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
अंतिम संस्कार के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उनके बड़े पुत्र डॉ. रमेश कुमार उपाध्याय ने उन्हें मुखाग्नि दी। उपस्थित लोगों की आंखें नम थीं और हर कोई यही कह रहा था कि आज एक युग का अंत हो गया।
परिजनों ने जानकारी दी कि उनके श्राद्ध से जुड़े सभी कार्यक्रम आदित्यपुर ईच्छापुर बस्ती स्थित आवास से संपन्न होंगे।
सनातन धर्म की एक ज्योति बुझी
स्व. उपाध्याय मूलतः बिहार के बक्सर जिले के ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बड़की नैनीजोर के निवासी थे। अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध संत त्रिदंडी स्वामी जी महाराज से उन्होंने दीक्षा ली थी।
उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वैदिक परंपराओं के प्रचार-प्रसार, कर्मकांड और आध्यात्मिक अनुशासन के लिए समर्पित कर दिया। वे अपने इलाके में एक प्रखर विद्वान, सच्चे धर्माचार्य और कर्मकांड विशेषज्ञ के रूप में आदरपूर्वक याद किए जाते रहे।
उनके निधन पर जमशेदपुर से लेकर बक्सर तक शोकसभा आयोजित की गई, जहां वक्ताओं ने उन्हें “सनातन परंपरा के प्रहरी”, “वेदों के मर्मज्ञ” और “लोकसेवा में समर्पित संत” के रूप में स्मरण किया।
उनके निधन की खबर से शोक की लहर सिर्फ आदित्यपुर या बक्सर तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पूरे धर्मशास्त्र और कर्मकांड जगत के लिए एक गंभीर क्षति मानी जा रही है।
