= कुड़मी-आदिवासी नेताओं की चेतावनी— युवा पीढ़ी सावधान रहे, भाईचारे को न तोड़ने दें
जमशेदपुर : कोल्हान क्षेत्र में कुड़मी और आदिवासी समुदायों के बीच व्याप्त तनाव को देखते हुए झारखंड आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ नेताओं ने स्थिति को संभालने के लिए शांति और संयम का आह्वान किया है।
पूर्व सांसद कृष्णा मार्डी, पूर्व सांसद शैलेन्द्र महतो और घाटशिला से पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने स्पष्ट रूप से कहा कि माझी और महतो समुदायों के बीच संघर्ष की जो स्थिति पैदा हो रही है, वह किसी “अदृश्य शक्ति” द्वारा रची गई सोची-समझी साजिश का परिणाम है।
रोटी-बेटी के रिश्ते वाले समाज को बांटने की कोशिश: मार्डी
सिंहभूम से सांसद रह चुके कृष्णा मार्डी ने कहा कि कुड़मी और आदिवासी समाज के बीच पीढ़ियों पुराना सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ता रहा है।
माझी और महतो सिर्फ पड़ोसी नहीं, बल्कि रोटी-बेटी के रिश्तेदार हैं। झारखंड आंदोलन में दोनों समुदायों ने कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया।
आज इन्हें लड़ाने की कोशिश झारखंड की आत्मा पर चोट है।
उन्होंने हालिया रेल रोको आंदोलन के बाद उत्पन्न सामाजिक तनाव पर चिंता जताते हुए कहा कि कुछ लोग समाज को भड़काकर माहौल विषैला बना रहे हैं, और यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
मार्डी ने स्पष्ट कहा कि संथाल समाज ने कभी भी कुड़मी समाज से वैवाहिक संबंधों को लेकर विरोध नहीं किया, और इस प्रकार के विरोध पूर्णत: अनुचित हैं। उन्होंने युवाओं से संयम और विवेक से काम लेने की अपील की।
नए लड़कों को झारखंड का इतिहास नहीं पता: शैलेन्द्र
झारखंड आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक और दो बार के सांसद शैलेन्द्र महतो ने मौजूदा पीढ़ी को इतिहास की समझ न होने को वर्तमान विवाद का कारण बताया।
झारखंड की संस्कृति साझेदारी, सहयोग और सम्मान की रही है। माझी और महतो ने हमेशा एक-दूसरे का साथ दिया है— आंदोलन में भी, विकास में भी।
आज अगर कोई इस रिश्ते को तोड़ने की कोशिश कर रहा है, तो वह झारखंड को पीछे ले जाना चाहता है।
महतो ने आंदोलन के नाम पर गाली-गलौज और उग्र भाषा के इस्तेमाल की निंदा की और राज्य सरकार से ऐसे उकसावेबाजों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की।
अगर कोई वर्ग अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करता है, तो दूसरे वर्ग को उसे उकसाने या अपमानित करने का कोई अधिकार नहीं। यह परंपरा झारखंड की नहीं है।
उन्होंने विधायक जयराम महतो पर भी कटाक्ष करते हुए उनके बयानों को “भड़काऊ” बताया और कहा कि ऐसे नेता राज्य के सामूहिक हित से अधिक व्यक्तिगत राजनीति साध रहे हैं।
कोई हमें आपस में लड़ा रहा, बेसरा ने जताई साजिश की आशंका
साक्षात्कार की शुरुआत करते हुए घाटशिला के पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने स्पष्ट कहा कि जो कुछ भी हो रहा है, वह अचानक नहीं है।
माझी और महतो पहले मुर्गा लड़ाया करते थे, आज अज्ञानता में खुद लड़ रहे हैं। फर्क बस इतना है कि अब कोई और उन्हें लड़वा रहा है। यह एक गहरी साजिश है, जिसकी जांच होनी चाहिए।
बेसरा ने बताया कि 2010 में अर्जुन मुंडा सरकार के समय कुछ जातियों को आदिवासी सूची में शामिल किया गया था, लेकिन विधिक प्रक्रिया के तहत।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक मार्ग पर चलकर जो मांगे हैं, वो न्यायालय और सरकार से ही पूरी हो सकती हैं, न कि एक-दूसरे को नीचा दिखाकर।
परिसीमन से घट सकती आदिवासी सीटें, शैलेन्द्र व बेसरा की चेतावनी
दोनों वरिष्ठ नेताओं ने आगामी 2026 की जनगणना आधारित परिसीमन को लेकर भी गंभीर चिंता जताई।
उनका कहना था कि आदिवासी आबादी में गिरावट के कारण राज्य की 14 आरक्षित लोकसभा सीटों में से कम से कम पांच खत्म हो सकती हैं, जिनमें राजमहल और घाटशिला जैसी सीटें भी शामिल हैं।
अगर आबादी के आधार पर अनुसूचित क्षेत्रों का पुनर्गठन हुआ तो वर्तमान में जो 14 जिले 5वीं अनुसूची में आते हैं, उनकी संख्या घटकर केवल 5 रह सकती है।
यह झारखंड के आदिवासी समुदाय के लिए बड़ा झटका होगा, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
झारखंड संघर्षों से बना है, इसे बंटने न दें, तीनों नेताओं की अपील
तीनों नेताओं ने अपने संयुक्त बयान में राज्य के युवाओं और समुदायों से अपील की कि झारखंड संघर्षों और बलिदानों से बना है। इसे नफरत और गलतफहमियों से नहीं, बल्कि भाईचारे और समझदारी से आगे ले जाया जा सकता है।”
उन्होंने आग्रह किया कि राजनीतिक फायदे के लिए समाज को बांटने वाली ताकतों से सावधान रहें और आपसी एकता बनाए रखें।
