निजी बैंक उड़ा रहे श्रम कानून की धज्जियां : यूनियन
जमशेदपुर : असंगठित मजदूर यूनियन ने आरोप लगाया है कि एक निजी बैंक प्रबंधन श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ा रहा है। यूनियन ने निजी बैंक प्रबंधन एवं ठेका प्रतिष्ठान पर मिलकर श्रम कदाचार और ठेका मजदूरों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। इसलिए उसके खिलाफ केन्द्र सरकार के उप मुख्य श्रमायुक्त धनबाद के यहां शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसकी सुनवाई लंबित है।
धातकीडीह स्थित ठक्कर बप्पा भवन में संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी दी गई। कहा गया कि बैंक प्रबंधन साफ-सफाई, पेंट्री बॉय, रनर बॉय एवं सुरक्षा कार्य ठेका एजेंसियों के माध्यम से करवा रहा है। यह स्थायी प्रकृति का एवं लगातार चलने वाला कार्य है। वर्तमान समय में जो भी मजदूर कार्यरत हैं वे 10 वर्षों से भी अधिक समय से लगातार काम कर रहे हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह स्थायी प्रकृति का कार्य है। लेकिन इन मजदूरों की मजदूरी दर किस नीति से निर्धारित की गई है, इसका कोई हिसाब नहीं है। पूरे झारखंड में बैंक प्रबंधन ठेका एजेंसियों के माध्यम से मनमाने दर से मजदूरी भुगतान करती है। उनकी कोई सेवा शर्त नहीं है। सुरक्षा बलों से भी 365 दिन कार्य लिया जाता है। उन्हें सप्ताहिक अवकाश भी नहीं दिया जाता है। इसके अलावा उपार्जित अवकाश, कैजुअल लीव, पर्व-त्यौहार एवं राष्ट्रीय अवकाश की भी छुट्टी नहीं दी जाती है। सालाना बोनस नहीं दिया जाता है। इसके विरुद्ध उप मुख्य श्रमायुक्त केंद्र सरकार धनबाद के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई है। इस बीच बैंक प्रबंधन ने मजदूरों को काम से बेदखल करने के लिए ठेका ऐजेंसियों के मदद से मजदूरों को प्रताड़ित करने के लिए श्रम कदाचार का सहारा लेना शुरू कर दिया है। इसके विरोध में मजदूरों ने सहायक श्रमायुक्त केंद्र सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराई है। यूनियन को सूचना है कि पूरे झारखंड में लगभग सभी प्राइवेट बैंकों में इसी तरीके से दलित, आदिवासी एवं अन्य गरीब मजदूरों को हक से वंचित रखा जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि पूरे झारखंड में प्राइवेट बैंकों को मैन पावर सप्लाई करने वाली ठेका एजेंसियां ठेका कानून के तहत ठेका चलाने का लाइसेंस श्रम विभाग से नहीं लिया है। साथ ही मुख्य नियोजक होने के नाते प्राइवेट बैंकों को प्रबंधन द्वारा ठेका प्रतिष्ठान बहाल करने का भी लाईसेंस स्थानीय केंद्रीय श्रम मंत्रालय से लेना चाहिए था जो नहीं लिया जिसके चलते राष्ट्र की आर्थिक क्षति हो रही है। इसलिए इस अन्याय के खिलाफ यूनियन ने कानूनी लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया है।
