फ्री लीगल एड कमेटी के अध्यक्ष प्रेम चंद्र जी नहीं रहे, डायन बिसाही के खिलाफ लड़ी लंबी लड़ाई, बना कानून

जमशेदपुर : जमशेदपुर के सोनारी निवासी फ्री लीगल एड कमेटी के अध्यक्ष प्रेम चंद्र जी का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। उनका शव टीएमएच में रखा गया है।

अंधविश्वास आधारित डायन कुप्रथा के खिलाफ कानून बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाले जमशेदपुर, झारखंड के प्रेमचंद ने लंबी लड़ाई लड़ी। प्रेमचंद की संस्था फ्लैक (फ्री लीगल एड कमेटी) ने ही बिहार सरकार को डायन कुप्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1995 का ड्राफ्ट सौंपा था। इसी के आधार पर बिहार सरकार ने 1999 में कानून बनाया था। देश में यह पहली सरकार थी, जिसने डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनाया।

बाद में इसी कानून को सात राज्यों ने अपनाया। जिसमें बिहार के अलावा झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र,असम और ओडिशा शामिल हैं। जहां कहीं भी डायन के नाम पर हत्या या उत्पीडऩ की शिकायत मिलती थी प्रेमचंद वहां पहुंच जाते थे। वह पीडि़त की मदद करने के साथ प्रताड़ित करने वालों को सजा दिलाने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए भी तत्पर रहते थे। हाल ही में उन्होंने अंधिवश्वास के खिलाफ जागरूकता को कक्षा छह से लेकर पीजी तक के पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए प्रयासरत रहे।

अंधिवश्वास के खिलाफ जागरुकता जरूरी

प्रेमचंद कहते थे कि डायन कळ्प्रथा का अस्तित्व अशिक्षा और अंधिवश्वास के कारण है। जागरूकता इसके खिलाफ एक बड़ा हथियार है। झारखंड में डायन-बिसाही के नाम पर महिला-पुरुषों को प्रताड़ित करने और पीट-पीट कर मार डालने की घटनाएं आम हैं। अमानवीय प्रताड़ना का सिलसिला आज भी जारी है। हिंसा की सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं ही होती हैं। आम लोगों के सहयोग से ही इस पर पूरी तरह अंकुश लग सकता है। राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम, 2001 बना, बावजूद इसके डायन-बिसाही के नाम पर प्रताड़ना और हत्या के मामलों में कमी नहीं आ रही है, लेकिन इस कानून ने पीड़ितों को सहारा जरूर दिया है।ताजा घटना पर गौर करें तो पश्चिम सिंहभूम में डायन बिसाही के शक में मां और बेटे को जिंदा जला दिया गया जबकि पति का इलाज चल रहा है।

लंबे संघर्ष के बाद मिली कामयाबी

प्रेमचंद बताते थे कि वर्ष 1991 की एक घटना ने उन्हें और उनके साथियों को अंदर से हिला दिया। तब जमशेदपुर के मनीकुई गांव में एक महिला को डायन होने के आरोप में पीटा जाने लगा, बचाव करने पर उसके पति व एक बेटे को भी पीट-पीट कर मार डाला गया। इस घटना के उन्होंने तय कर लिया कि डायन कुप्रथा केखिलाफ जो भी हो सके, करना है। उन्हें उम्मीद थी कि आधुनिक समाज एक दिन अवश्य चेतेगा क्योंकि ऐसी क्रूरता किसी सभ्य समाज में कतई स्वीकार्य नहीं हो सकती है।

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