स्कूल ऑफ होप के विशेष बच्चों ने बनाई राखियां, 14 स्कूलों में होगी आपूर्ति

जमशेदपुर : शहर का स्कूल ऑफ होप न केवल एक शिक्षण संस्थान है, बल्कि यह उन विशेष बच्चों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो मानसिक और शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं। इस स्कूल में बच्चों को केवल शिक्षा ही नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में हर जरूरी कौशल भी सिखाया जाता है। इसी कड़ी में आने वाले रक्षाबंधन पर्व को लेकर स्कूल ऑफ होप के बच्चों द्वारा हाथों से राखी बनाने का कार्य जोरों पर है। यह न सिर्फ उनके कौशल विकास का हिस्सा है, बल्कि इससे उन्हें आत्मविश्वास भी मिलता है कि वे समाज में एक सक्रिय योगदान दे सकते हैं।

इन विशेष बच्चों द्वारा बनाई गई राखियां सुंदरता और भावनात्मक मूल्य दोनों से परिपूर्ण होती हैं।हरराखी हाथ से बनाई जाती है, जिसमें रेशमी धागे, मोती, कलात्मक सजावट और रंग-बिरंगे डिजाइन होते हैं।बाजार में जहां राखियों की कीमतें आसमान छूती हैं, वहीं ये बच्चे मात्र ₹20 में एक राखी उपलब्ध करा रहे हैं।

इस बार स्कूल ऑफ होप ने अपने द्वारा बनाई गई राखियों को जमशेदपुर के 14 अलग-अलग स्कूलों में भेजने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सभी बच्चे मिलकर टीम वर्क के साथ राखियां बना रहे हैं।

राखियों की बिक्री से जो भी आमदनी होती है, उसे दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। बच्चों के व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक संसाधन (स्टेशनरी, ट्रेनिंग मटेरियल आदि)।स्कूल के बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों के लिए।

राखी बनाना इन बच्चों की वोकेशनल ट्रेनिंग का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत उन्हें मोमबत्ती बनाना, पेंटिंग, थैला सिलाई, कढ़ाई और अन्य हस्तकला से जुड़ी चीजें भी सिखाई जाती हैं। बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना और यह सिखाना कि किसी भी परिस्थिति में वे खुद का जीवनयापन कर सकते हैं।स्कूल प्रशासन और शिक्षक समुदाय की ओर से समाज से यह अपील की जा रही है कि इन विशेष बच्चों के प्रयासों को सराहा जाए और उनकी बनाई हुई राखियों को प्राथमिकता दी जाए। इससे न केवल उन्हें आर्थिक सहयोग मिलेगा बल्कि उनके आत्मबल में भी वृद्धि होगी।

संवेदनशीलता और कौशल से भरी यह पहल समाज के लिए एक बड़ा संदेश है : संभावनाएं वहां भी होती हैं, जहां हम अक्सर देखना बंद कर देते हैं।रक्षाबंधन के इस पावन पर्व पर यदि हम इन बच्चों की बनाई राखियों को अपने रिश्तों में जोड़ें, तो यह केवल एक धागा नहीं बल्कि उम्मीद की एक डोर होगी।

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