September 7, 2026
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जमशेदपुर में अर्जुन मुंडा का विरोध, ग्रामसभा ने यूसील का दलाल बताकर फूंका पुतला | #ArjunMunda#UCIL

जमशेदपुर – पूर्वी सिंहभूम के तुरामडीह स्थित नांदूप गांव में सोमवार को उस समय विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई जब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा विस्थापित एवं प्रभावित ग्रामीणों के समर्थन में गांव पहुंचे।

इस दौरान पारंपरिक ग्रामसभा के सदस्यों ने उनका जोरदार विरोध किया। विरोध कर रहे लोगों ने अर्जुन मुंडा और उनके समर्थकों को यूसील प्रबंधन का दलाल बताते हुए पुतला दहन किया और नारेबाजी की। ग्रामसभा के लोगों का आरोप है कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आता है, लेकिन यहां आदिवासियों के अधिकारों और हितों की लगातार अनदेखी की जा रही है।

वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केवल विस्थापितों और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की रक्षा करना है। अर्जुन मुंडा के अनुसार यूसील प्रबंधन के साथ हुई बातचीत में उन्होंने केंद्र सरकार के निर्धारित मानकों और पूर्व में हुए समझौतों के आधार पर स्थानीय लोगों को रोजगार, मुआवजा और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग उठाई है।

उन्होंने ग्रामसभा द्वारा लगाए गए दलाली के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक सुनियोजित साजिश बताया।

दरअसल, नांदूप गांव के विस्थापितों का कहना है कि तुरामडीह माइंस उनकी जमीन पर स्थापित की गई है और सबसे अधिक प्रभावित इसी गांव के लोग हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी प्रबंधन और ग्रामीणों के बीच रोजगार और पुनर्वास को लेकर जो समझौते हुए थे, उन्हें आज तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में स्थानीय लोगों को ठेका कार्यों में प्राथमिकता, लंबित बहाली, पुनर्वास, धार्मिक स्थलों का पुनर्निर्माण, पेयजल, बिजली, सड़क, शिक्षा और प्रदूषण नियंत्रण जैसी कई मांगें शामिल हैं।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।

फिलहाल इस पूरे मामले में दो अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं। एक ओर ग्रामसभा पूर्व मुख्यमंत्री की भूमिका पर सवाल उठा रही है, वहीं दूसरी ओर अर्जुन मुंडा स्वयं को विस्थापितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाला बता रहे हैं।

अब देखना होगा कि प्रशासन और संबंधित एजेंसियां इस पूरे मामले में क्या कदम उठाती हैं और विस्थापितों की मांगों का समाधान कब तक निकल पाता है।


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