भारतीय नृत्य को नई पहचान देने वाली कलाकार का जीवन-सफर
मुख्य बिंदु:
- 27 जून को अमला शंकर की जयंती, 1919 में हुआ था जन्म
- उदय शंकर की नृत्य मंडली से जुड़कर रचा इतिहास
- 2011 में बंग विभूषण, 2012 में टैगोर रत्न से सम्मानित
नई दिल्ली – 27 जून का दिन भारतीय नृत्य जगत की एक महान साधिका अमला शंकर की स्मृति से जुड़ा है। उन्होंने परंपराओं को तोड़कर नृत्य को साधना और जीवनशैली का रूप दिया।
अमला शंकर का जन्म 27 जून 1919 को जेसोर में हुआ था, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है। उनका परिवार पहले से ही कला और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ था।
उनके पिता अक्षय कुमार नंदी प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्ति थे। इसी माहौल में बचपन से ही उनके भीतर कला के प्रति रुझान पनपने लगा।
उस दौर में किसी लड़की के लिए नृत्य की दुनिया में प्रवेश करना सरल नहीं था। हालांकि, अमला शंकर ने धीरे-धीरे इन सामाजिक सीमाओं को पीछे छोड़ दिया।
1931 में, जब वे केवल 11 वर्ष की थीं, अमला अपने पिता के साथ फ्रांस गई। वहीं उनकी जिंदगी ने एक निर्णायक मोड़ लिया।
फ्रांस में उनकी मुलाकात भारतीय नृत्य के प्रसिद्ध कलाकार उदय शंकर से हुई। उस समय वे यूरोप में भारतीय नृत्य को नई पहचान दिलाने में जुटे थे।
उनका नृत्य देखकर अमला की पूरी दुनिया ही बदल गई। धीरे-धीरे वे उनकी नृत्य मंडली का हिस्सा बन गईं और यहीं से उनकी असली यात्रा शुरू हुई।
इसके बाद अमला शंकर ने यूरोप के कई देशों में उदय शंकर की मंडली के साथ भारतीय नृत्य का प्रदर्शन किया। विदेशी मंचों पर भारतीय कला को स्थापित करना तब आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने यह संभव कर दिखाया।
1939 में अमला शंकर और उदय शंकर का विवाह हुआ, जो दो कला साधकों का मिलन था। दोनों ने मिलकर भारतीय नृत्य को एक नई दिशा दी।
उनकी सबसे चर्चित फिल्म ‘कल्पना’ 1948 में रिलीज हुई, जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। यह फिल्म तब व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही, मगर आज इसे भारतीय नृत्य और सिनेमा की धरोहर माना जाता है।
बाहर से चमकदार नजर आने वाला उनका जीवन भीतर से कठिन संघर्षों से भरा था। उदय शंकर के अन्य महिलाओं से संबंधों ने उन्हें गहरी भावनात्मक पीड़ा दी, फिर भी उन्होंने नृत्य का साथ कभी नहीं छोड़ा।
उन्होंने अपने दर्द को कला में बदलते हुए मंच को ही अपनी ताकत बना लिया। समय के साथ जब उनके और उदय शंकर के रास्ते अलग हुए, तब भी उन्होंने हिम्मत नहीं खोई।
इसके बाद उन्होंने कोलकाता में नृत्य संस्थान की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने वर्षों तक भारतीय नृत्य परंपरा को जीवित रखने का काम किया।
बेटे आनंद की मृत्यु ने उन्हें गहरे सदमे में डाल दिया, फिर भी उन्होंने नृत्य सिखाना कभी बंद नहीं किया। उनके योगदान को देखते हुए समय-समय पर उन्हें कई बड़े सम्मान भी मिले।
2011 में पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें ‘बंग विभूषण’ से सम्मानित किया। इसके अगले ही वर्ष, यानी 2012 में, उन्हें संगीत नाटक अकादमी का टैगोर रत्न पुरस्कार भी प्रदान किया गया।
24 जुलाई 2020 को 101 वर्ष की आयु में अमला शंकर का निधन हो गया। उनके जाने से एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी कला आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
(आईएएनएस से प्राप्त इनपुट पर आधारित)
