अब धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़क जाम करने की इजाजत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दे दी एक्शन लेने की छूट, राज्य को हस्तक्षेप का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़क जाम नहीं किया जा सकता
पूजा-पाठ की स्वतंत्रता मान्य, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था सर्वोपरि
सबरीमाला सहित कई मामलों की सुनवाई के दौरान आई टिप्पणी
संविधान पीठ में 9 न्यायाधीश कर रहे हैं सुनवाई
अनुच्छेद 25(2)(क) के तहत राज्य को हस्तक्षेप का अधिकार
धार्मिक प्रथाओं से धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां प्रभावित होने पर सरकार कर सकती है कार्रवाई
NEW DELHI : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर धार्मिक समुदाय को पूजा-पाठ और आस्था के पालन में स्वायत्तता प्राप्त है और न्यायालय उसके धार्मिक मामलों में दखल नहीं देता, लेकिन जब इन गतिविधियों का असर धर्मनिरपेक्ष या सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।
यह टिप्पणी सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश, भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान हिंदू धर्म आचार्य सभा की ओर से पेश अधिवक्ता अक्षय नागराजन ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(क) के तहत सरकार किसी धार्मिक संप्रदाय के मूल अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत केवल आस्था ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी बाहरी अभिव्यक्तियाँ—जैसे पूजा-पद्धति, अनुष्ठान और परंपराएं—भी संरक्षित हैं।
इस पर न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि यदि धार्मिक गतिविधियों से धर्मनिरपेक्ष कार्य प्रभावित होते हैं, तो राज्य को हस्तक्षेप का अधिकार है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी मंदिर के वार्षिक उत्सव या रथ यात्रा के नाम पर आसपास की सभी सड़कों को बंद नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने दोहराया कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और आम नागरिकों के अधिकारों के ऊपर नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है।
