==मिसलेनियस सप्ताह के चलते नहीं हो सकी कानूनी बहस; टाउनशिप अधिसूचना को रद्द कर नगर निगम बनाने की है मांग
नई दिल्ली/जमशेदपुर। जमशेदपुर के प्रशासनिक भविष्य और इसे ‘नगर निगम’ का दर्जा देने से जुड़ी महत्वपूर्ण याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो सकी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की खंडपीठ के समक्ष यह मामला सूचीबद्ध (Listed) था। हालांकि, शीर्ष अदालत में इस सप्ताह को ‘मिसलेनियस सप्ताह’ (Miscellaneous Week) घोषित किए जाने के कारण मामले को फिलहाल टाल दिया गया है।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें
जवाहरलाल शर्मा द्वारा दायर रिट याचिका (सिविल) संख्या 483/2025 में जमशेदपुर को नगर निगम बनाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को चुनौती दी गई है:
संवैधानिक चुनौती: संविधान के अनुच्छेद 243Q(1) के परंतुक (Proviso) और झारखंड नगरपालिका अधिनियम, 2011 की धारा 481 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
अधिसूचना को रद्द करने की मांग: राज्य सरकार द्वारा 28 दिसंबर 2023 को जमशेदपुर को एक ‘इंडस्ट्रियल टाउनशिप’ घोषित करने वाली अधिसूचना को निरस्त करने की मांग की गई है।
नगर निगम का गठन: प्रार्थी का तर्क है कि जमशेदपुर जैसे बड़े महानगर के लिए नगर निगम का गठन अनिवार्य है ताकि निवासियों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और बेहतर नागरिक सुविधाएं मिल सकें।
मिसलेनियस सप्ताह का प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट में जब ‘मिसलेनियस सप्ताह’ (विविध मामलों का सप्ताह) होता है, तो बेंच अक्सर नए दाखिलों और संक्षिप्त सुनवाई वाले मामलों को प्राथमिकता देती है। जवाहरलाल शर्मा बनाम झारखंड राज्य जैसे विस्तृत संवैधानिक और कानूनी बहस वाले मामलों के लिए अब कोर्ट द्वारा नई तारीख निर्धारित की जाएगी।
क्यों अहम है यह मामला?
जमशेदपुर दशकों से ‘नोटीफाइड एरिया कमेटी’ (JNAC) के माध्यम से प्रशासित हो रहा है। टाउनशिप बनने से शहर का प्रबंधन काफी हद तक कंपनी और प्रशासन के तालमेल पर आधारित हो गया है, जबकि याचिकाकर्ता का दावा है कि यह शहर के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि जमशेदपुर एक औद्योगिक टाउनशिप बना रहेगा या यहां मेयर और पार्षदों वाली नगर निगम व्यवस्था लागू होगी।
