बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को फांसी की सजा का ऐलान; मानवता के खिलाफ अपराध के लिए दोषी
ढाका : बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को अंतरराष्ट्रीय क्राइम ट्रिब्यूनल ने जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और हत्याओं के लिए मौत की सजा सुनाई। हसीना और दो अन्य, पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमलैंड और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून पर मानवता के विरुद्ध अपराधों का मुकदमा चलाया गया।
हसीना को तीन मामलों में दोषी पाया गया- न्याय में बाधा डालना, हत्याओं का आदेश देना और दंडात्मक हत्याओं को रोकने के लिए कदम उठाने में फेल रहना।
इसके अलावा, कोर्ट ने बांग्लादेश के पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को मौत की सजा से बख्श दिया। अल-मामून, सरकारी गवाह बन गए थे।
1,400 से ज्यादा लोग मारे गए
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 जुलाई से 5 अगस्त, 2024 के बीच हुए विरोध प्रदर्शनों में 1,400 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए। इनमें से ज्यादातर लोग सुरक्षा बलों की गोलीबारी में मारे गए, जो 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद से बांग्लादेश में सबसे भीषण हिंसा थी।
मुकदमे के दौरान, अभियोजकों ने अदालत को बताया कि उन्होंने छात्रों के नेतृत्व वाले विद्रोह को दबाने के लिए हसीना द्वारा घातक बल प्रयोग करने के सीधे आदेश के सबूत खोज निकाले।
हसीना ने ही रखी थी ICT की नींव
जिस इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (ICT) ने शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाई, उसकी स्थापना हसीना की ही अवामी लीग सरकार द्वारा 2010 में की गई थी। इसका उद्देश्य 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान किए गए अत्याचारों के लिए आरोपियों पर मुकदमा चलाना था, जब देश ने पाकिस्तान से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी।
ट्रिब्यूनल ने जवाबदेही की लंबे समय से चली आ रही राष्ट्रीय मांग को पूरा किया, लेकिन जल्द ही यह देश के सबसे राजनीतिक रूप से विभाजनकारी संस्थानों में से एक बन गया। अगले दशक में, ICT ने कई विपक्षी नेताओं, खासकर जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेताओं को दोषी ठहराया और उन्हें फांसी पर लटकाया।
कई टॉप राजनेताओं की फांसी की वैश्विक अधिकार समूहों ने आलोचना की, जिन्होंने ट्रिब्यूनल पर प्रक्रियागत खामियों, जल्दबाजी में सुनवाई और चुनिंदा निशाना साधने का आरोप लगाया। उस वक्त हसीना सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया।
विवादों के बावजूद, आईसीटी हसीना के सबसे शक्तिशाली न्यायिक उपकरणों में से एक बना रहा। एक ऐसा कोर्ट जिसे उन्होंने बनाया, विस्तार किया और जिसका भरपूर बचाव किया। अगस्त 2024 में उनकी सरकार के गिरने के बाद नए अंतरिम प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर सरकारी कार्रवाई से जुड़ी हत्याओं और दुर्व्यवहारों की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का पुनर्गठन किया।
अब क्या होगा, शेख हसीना को अब बांग्लादेश के हवाले करेगा भारत ?
बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (आईसीटी) की ओर से वहां की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवाधिकार के खिलाफ अपराध का दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भारत के सामने एक नई चुनौती खड़ी हुई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब अंतरराष्ट्रीय संधि की वजह से भारत के लिए उन्हें प्रत्यर्पित करना जरूरी हो जाएगा? या फिर भारत ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है? अवामी लीग की मुखिया पिछले साल 5 अगस्त से बांग्लादेश में छात्रों के हिंसक विद्रोह के बाद से भारत में शरण ली हुई हैं।
‘मेरी मां भारत में सुरक्षित है’
बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (आईसीटी) की ओर से शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भारत के सामने पैदा हो रहे सवालों की पड़ताल करने से पहले बांग्लादेश के पू्र्व पीएम के बेटे के रुख को देख लेते हैं। हसीना के बेटे और एडवाइजर सजीब वाजिद ने इसी तरह के फैसले की आशंका के आधार पर रॉयटर्स से पहले ही कहा था, ‘वो मेरी मां का क्या कर सकते हैं? मेरी मां भारत में सुरक्षित है। भारत उन्हें पूरी सुरक्षा दे रहा है।….जैसे एक राष्ट्र प्रमुख को दी जाती है।’यूनुस सरकार बढ़ाएगी दबाव
बहरहाल, यह एक बेटे की उम्मीदें हैं, लेकिन इतना तय है कि आईसीटी के फैसले के बहाने मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए दबाव बढ़ाने की पूरा कोशिश करेगी। अबतक यूनुस सरकार भारत से ऐसा कह रही थी, लेकिन औपचारिक अनुरोध से बचती रही है। कुछ मीडिया रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि शायद भारत, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री को प्रत्यर्पित न करे।
भारत-बांग्लादेश में प्रत्यर्पण संधि
दोनों देशों के बीच 2013 में हसीना के कार्यकाल में ही एक प्रत्यर्पण संधि हुई थी। इसमें एक प्रावधान ये था कि राजनीति से प्रेरित आरोप में प्रत्यर्पण का अनुरोध ठुकराया जा सकता है। लेकिन, इसी संधि में हत्या, अपहरण, बम विस्फोट और आतंकवाद जैसे गंभीर अपराध को राजनीतिक रूप प्रेरित नहीं माने जाने का भी प्रावधान है। ऐसे में कुछ रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हत्या और नरसंहार की दोषी होने की वजह से भारत के लिए इस आधार पर उन्हें प्रत्यर्पित नहीं करना आसान नहीं है।
मांग ठुकराने के भी कुछ प्रावधान
यही नहीं, 2016 में इस संधि में एक और प्रावधान भी जोड़ा गया, जिसके अनुसार अपराध का सबूत देना अनिवार्य नहीं है, प्रत्यर्पण के सिए एक अदालत से गिरफ्तारी वारंट जारी होना भी पर्याप्त है। ऐसे में एक जिला अदालत से जारी गिरफ्तारी वारंट से भी भारत के लिए चुनौती बढ़ जाएगी। हालांकि, कुछ विश्लेषकों की राय में संधि में इसके अलावा भी कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिसके आधार पर भारत, बांग्लादेश के प्रत्यर्पण की मांग को ठुकरा सकता है।
हसीना के केस में क्या करेगा भारत
कुछ जानकारों का कहना है कि अगर आरोप न्यायिक प्रक्रिया के हित में नहीं हैं तो भी भारत प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। यही नहीं, अगर आरोप सामाजिक अपराधों से जुड़े हैं और सीधे आपराधिक कानून के दायरे में नहीं आते हैं, तो ऐसे अनुरोधों को ठुकराया जा सकता है। प्रत्यर्पण के बाद शेख हसीना के साथ बांग्लादेश में बुरे बर्ताव की भी आशंका है या उन्हें वहां निष्पक्ष न्याय मिल पाना मुश्किल है, प्रत्यर्पण को इन आधारों पर भी मना किया जा सकता है। भारत के पास पूर्व शिक्षा मंत्री दीपू मोनी का उदाहरण है, जिन पर कोर्ट कैंपस परिसर में भी हमला हो गया था। यह भी बताया जा सकता है कि औद्योगिक सलाहकार सलमान एफ रहमान को कोर्ट में पेशी के दौरान अपमानित किया गया था।
