जमशेदपुर; शहर में करवाचौथ का त्योहार इस बार भी श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। सुहाग की रक्षा और पति की लंबी उम्र की कामना के लिए मनाया जाने वाला यह पर्व शुक्रवार को शहर की फिज़ाओं में धार्मिक रंग घोल गया।
साकची के एक निजी स्कूल सभागार में आयोजित विशेष कार्यक्रम में सैकड़ों सुहागिन महिलाएं एकत्र हुईं, जहां उन्होंने पूरे विधि-विधान से करवाचौथ व्रत किया। पूरे दिन निर्जला व्रत रखकर, सज-धज कर और कथा सुनकर उन्होंने इस पर्व को पारंपरिक तरीके से मनाया।
व्रत, श्रृंगार और चांद की प्रतीक्षा
कार्यक्रम की शुरुआत करवाचौथ व्रत कथा से हुई, जिसे महिलाओं ने ध्यानपूर्वक सुना। इस कथा के माध्यम से उन्होंने व्रत के धार्मिक महत्व और परंपरा को जाना। सभी महिलाओं ने पारंपरिक वस्त्र, 16 श्रृंगार, और पूजा की थाली के साथ इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा से निभाया।
महिलाओं ने बताया कि करवाचौथ का व्रत पूरे साल का सबसे पवित्र और प्रतीक्षित दिन होता है। इस दिन वे दिनभर बिना जल ग्रहण किए निर्जला व्रत रखती हैं और रात को चांद निकलने के बाद ही अपने पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलती हैं।
क्या बोलीं महिलाएं?
कार्यक्रम में शामिल पूजा सिन्हा नामक महिला ने कहा कि इस व्रत का भाव बहुत गहरा है। ये सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि पति के प्रति समर्पण और प्रेम का प्रतीक है। हम पूरे साल इस दिन का इंतज़ार करते हैं।”
वहीं, काजल अग्रवाल ने बताया कि आज के दिन खुद को सोलह श्रृंगार में सजाकर जब चांद और फिर पति का चेहरा देखती हूं, तो लगता है कि सारी तपस्या सफल हो गई।”
आयोजन में दिखी सांस्कृतिक छटा
साकची में हुए इस सामूहिक आयोजन में महिलाएं पारंपरिक परिधान — लाल, गुलाबी और सुनहरे रंगों की साड़ियों व लहंगे में सजी हुई थीं। आयोजन स्थल को दीपों, फूलों और रंगोली से सजाया गया था। संगीत की मधुर धुनों और मंत्रोच्चार के बीच पूरी फिज़ा भक्ति भाव में रंगी हुई थी।
कार्यक्रम में पूजा, कथा वाचन, श्रृंगार स्पर्धा और करवाचौथ विशेष गीत जैसे कई सांस्कृतिक पहलू शामिल रहे।
चांद का दीदार, पति के हाथों से व्रत खोलना
देर शाम जब चांद निकला, तो सभी महिलाओं ने चलनी से चंद्रमा और फिर अपने पति का मुख देखकर पूजा संपन्न की। इसके बाद उन्होंने पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया। कई महिलाओं की आंखें उस पल भावुकता से नम थीं।
आत्मीयता और आस्था का पर्व
करवाचौथ का यह पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय नारी की आस्था, प्रेम और परिवार के प्रति समर्पण का प्रतीक है। जमशेदपुर की महिलाओं ने सामूहिक रूप से इस परंपरा को आगे बढ़ाकर न सिर्फ अपनी संस्कृति का सम्मान किया, बल्कि आपसी मेल-जोल और सामाजिक एकता को भी सशक्त किया।
