जमशेदपुर : स्कूली शिक्षा के लिए पूरे झारखंड में एक बेहतर केंद्र के रूप में पहचान रखनेवाले शहर जमशेदपुर में इन दिनों वैसे प्राइवेट स्कूलों में बीपीएल कोटे से होने वाले नामांकन पर विवाद तेज है. पूरी नामांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं. नामांकन में गड़बड़झाले का भी आरोप लग रहा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी हो रही.धरना प्रदर्शन का दौर भी जारी है और आंदोलन की भी धमकी दी जा रही,
क्यों पैदा होती इस तरह की स्थिति
जमशेदपुर की पहचान अच्छे स्कूलों वाले शहर के रूप में है जहां अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दूसरे शहरों की तुलना में कम शुल्क में दी जाती है. इसी कारण से लोगों की चाहत रहती है कि जमशेदपुर के स्कूलों में उनके बच्चों की पढ़ाई हो. अपने बच्चों का दाखिला शहर के अच्छे प्राइवेट स्कूलों में कराने की चाहत हर अभिभावक की होती है, इसके लिए वे लोग हर जतन करते मिलते हैं.
बीपीएल बच्चों के लिए भी अच्छा अवसर
झारखंड में वर्ष 2011-12 में ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ लागू किया गया था. इसके तहत राज्य के मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों के इंट्री क्लास में 25 फीसदी सीटों पर बीपीएल बच्चों के नामांकन का प्रावधान है. बीपीएल बच्चों के शिक्षण शुल्क का भुगतान राज्य सरकार करती है.
बीपीएल बच्चों के लिए सबसे अधिक सीटें जमशेदपुर में
बीपीएल कोटे से दाखिले को लेकर शहर में विवाद व बवाल होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि पूरे राज्य में बीपीएल कोटे की सबसे ज्यादा सीटें 1540 पूर्वी सिंहभूम में जिले में ही आरक्षित हैं. यदि अन्य जिलों की बात करें तो 1540, पश्चिमी सिंहभूम 184, सरायकेला-खरसावां 354, रांची 1213, बोकारो 528, गोड्डा 35, चतर 29, देवघर 361, धनबाद 684, दुमका 233, गढ़वा 231, गिरिडीह 390, गुमला 47, हजारीबाग 209, जामताड़ा 93, खूंटी 48, कोडरमा 99, लोहरदगा 65, पाकुड़ 62, पलामू 141, रामगढ़ 248 व सिमडेगा 180 सीटे हैं.
बड़ी बात यह कि बीपीएल कोटे की सीटें अमूमन भरती नहीं. राज्य के दो चार जिलों को छोडक़र पूर्वी सिंहभूम समेत राज्य के अन्य जिलों में बीपीएल कोटे की सीटें खाली ही रह जाती हैं. इन सीटों में बाद में सामान्य कोटे के बच्चों का दाखिला कर लेने की भी बाते आती हैं.
दरअसल खाली रहनेवाली बीपीएल सीटों पर होने वाला दाखिला ही विवाद का कारण होता है.कहते हैं कि पैसा या पैरवी की बदौलत करीब बच्चों के लिए खाली सीटों पर अमीर परिवार के बच्चों का दाखिला कर लिया जता है.
यही नहीं, आरोप तो यह भी लगते हैं कि बीपीएल परिवारों के अभिभावकों को इतना दौड़ा दिया जाता है कि उनमें से अधिकांश अपने बच्चों का दाखिला कराने से पहले ही हिम्मत हार जाते हैं. नतीजतन उनके कोटे के लाभ किसी ओर को मिल जाता है.
जमशेदपुर अभिभावक संघ के अध्यक्ष डॉ. उमेश बताते हैं कि कई सकूल ऐसे है जो इस कोटे के अंतर्गत नामांकन ही नहीं लेना चाहते हैं. बिना कारण बीपीएल अभिभावकों को दौड़ाया जाता है, ताकि वे परेशान होकर बच्चों के नामांकन का प्रयास छोड़ दे.
जानकारों का कहना है कि बीपीएल कोटे के दाखिले को लेकर कुछ लोगों द्वारा इसलिए भी
बवाल काटा जाता है ताकि उनकी भी बात सुन ली जाए और खाली रह जानेवाली सीटों पर सामान्य तबके से नामांकन की स्थिति बने तो उनका भी काम बन जाए. जानकारों का कहना है कि जमशेदपुर के निजी स्कूलों में दाखिला कराना भी कुछ लोगों के लिए सालाना कारोबार बन गया है. इसमें बीपीएल कोटे की भी अहम भूमिका रहती है.
