उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अनीस रजा से पॉस्को अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा ख़ारिज किया: कहा पीड़िता की इच्छा मुकदमा चलाने की नहीं है

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक आरोपी से यह कहते हुए पॉस्को के अंतर्गत मुक्दमा हटा लिया कि आरोपी इस मुक़दमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है क्योंकि उसकी शादी हो गयी है।

इस मामले की रिपोर्टिंग करते हुए लाइव लॉ ने लिखा कि

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हाल ही में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत एक आपराधिक मुकदमे को यह देखते हुए खारिज कर दिया, कि पीड़िता जीवन में आगे बढ़ गई थी और उसका आरोपी पर मुकदमा चलाने का इरादा नहीं था।

न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि यद्यपि पॉस्को अधिनियम के अंतर्गत किए गए अपराध और आपराधिक मामले में शिकायत किए गए अन्य आईपीसी  अपराध सीआरपीसी की धारा 320 के अंतर्गत कंपाउंडेबल नहीं हैं, हालांकि, फिर भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हुआ जा सकता है कि आवेदक और पीड़ित (वयस्क होने पर) ने स्वतंत्र विवाह कर लिया था और अपने वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन खुशी-खुशी कर रहे थे।

कोर्ट ने कहा कि यदि इस मामले में मुक़दमे को जारी रखा जाएगा तो दो परिवार खराब हो जाएंगे। “चूंकि दोनों ने शादी कर ली है, और इस स्तर पर, जब वे वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर चुके हैं, तो वह बालिग हैं, उस स्थिति में, दिनांक 15।11।2020 को किए गए अपराधों को अनदेखा करना ही होगा जिससे वर्तमान सी-482 आवेदन के प्रत्येक पक्ष के परिवारों में शांति और सामंजस्य बना रहे, क्योंकि दोनों की ही शादी हो चुकी थी, “न्यायालय ने कहा।

न्यायालय ने आगे कहा: “सीआरपीसी की धारा 482 के अंतर्गत निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए, इस न्यायालय का विचार है कि 2020 के विशेष सत्र परीक्षण संख्या 45, “राज्य बनाम अनीस” को जारी रखने से अंततः लोगों के जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। और वह भी तब जब विशेषकर प्रतिवादी संख्या 2 ने न्यायालय के सम्मुख यह वक्तव्य दिया है कि वह इस वर्तमान आवेदन को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है।

यह निर्णय बहुत चौंकाने वाला तो है ही, परन्तु कहीं न कहीं यह न्यायिक प्रक्रिया में देरी की समस्या को भी प्रदर्शित करता है और यह निर्णय इसलिए भी हैरान करता है क्योंकि यह मामला पीड़िता की ओर से न होकर राज्य की ओर से था, अत: पीड़िता की इच्छा कैसे इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है? क्या न्याय अब इस बात दिया जाएगा कि पीड़िता और अपराधी एक “खुशहाल जीवन” जी रहे हैं? यह न्याय कैसे हो सकता है?

यदि इसी तर्क पर अपराधियों को छोड़ा जाता रहेगा कि अब मुकदमा चलाने से क्या लाभ क्योंकि अपराधी और पीड़िता अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ चुके हैं और सफल जीवन जी रहे हैं, तो समाज का क्या होगा? और वह भी बलात्कार जैसे मामलों को लेकर, एवं बच्चों के साथ हुए ऐसे कृत्यों को लेकर कैसे यह कहा जा सकता है कि “अपराधी और पीड़िता” खुशहाल जीवन जी रहे हैं?

इस निर्णय ने उस निर्णय की याद दिला दी है जब उच्चतम न्यायालय ने 4 वर्षीय बच्ची के बलात्कार और हत्या के मामले में मोहम्मद फ़िरोज़ को दी गयी फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया था। अब वह 20 वर्ष तक जेल में रहेगा। प्रश्न यही उठता है कि नौ वर्ष तक पीड़िता को न्याय की प्रतीक्षा करने के बाद अंतत: क्या मिला?

मामलों पर वर्षों तक बहसें होती हैं, और अंत में पीड़ित पक्ष को प्रतीक्षा के बाद कहीं न कहीं वह न्याय मिलता ही नहीं है, जिसकी आस में वह वर्षों तक न्यायालय की देहरी पर पड़ा रहता है।

किरण नेगी का मामले में जो निर्णय आया है वह भी इस बात पर जोर देता है कि कहीं न कहीं न्यायिक सुधार की इस देश को अत्यंत आवश्यकता है। क्योंकि यदि न्यायालय यह निर्णय देंगे कि पीड़िता नहीं चाहती है या फिर हर पापी का भी एक भविष्य होता है, तो फिर ऐसे में इस देश की साधारण जनता कहाँ जाएगी, कहाँ न्याय के लिए गुहार लगाएगी? ऐसे तमाम प्रश्न हैं!

(यह स्टोरी हिंदू पोस्ट का है और यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है। )

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