बंगाल SIR विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को दिया निर्देश, 1.25 करोड़ मतदाताओं की सूची सार्वजनिक हो

नई दिल्ली :पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर बढ़े विवाद के बीच ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की श्रेणी में रखे गए लगभग 1.25 करोड़ मतदाताओं की सूची ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक कार्यालयों और शहरी वार्ड कार्यालयों में अनिवार्य रूप से सार्वजनिक की जाए।

यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय दिया, जब तृणमूल कांग्रेस और राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि एसआईआर की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है और आम मतदाताओं को बिना स्पष्ट कारण नोटिस भेजे जा रहे हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव सात मई से पहले कराना संवैधानिक बाध्यता है, क्योंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल उसी दिन समाप्त हो रहा है।

‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ क्या है

चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान जिन मतदाताओं पर आपत्ति दर्ज की है, उन्हें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की श्रेणी में रखा गया है। इसमें प्रमुख तौर पर

-मतदाता और माता-पिता के नाम में असंगति

-मतदाता और अभिभावक की आयु में 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक का अंतर

-वर्ष 2002 की मतदाता सूची से वंशावली का मेल न बैठना जैसी विसंगतियां शामिल बताई गई हैं।

दस्तावेज और आपत्ति दर्ज कराने की सुविधा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि एसआईआर से प्रभावित सभी मतदाताओं को अपने दस्तावेज और आपत्तियां दाखिल करने का प्रभावी अवसर दिया जाना चाहिए। इसके लिए पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में विशेष काउंटर स्थापित किए जाएं।


पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह चुनाव आयोग को पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराए, ताकि सत्यापन प्रक्रिया में किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो। साथ ही, पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

‘एक करोड़ से अधिक लोग तनाव में’

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि एक करोड़ से ज्यादा लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं और इससे आम नागरिकों पर भारी मानसिक दबाव पड़ रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि आवश्यकता पड़ने पर वह आगे भी हस्तक्षेप करेगी।

तृणमूल सांसदों की आपत्ति

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन की याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब तलब कर चुका है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि आयोग ने बिना किसी लिखित आदेश या वैधानिक दिशा-निर्देश के ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसी नई श्रेणी बना दी।


याचिकाकर्ताओं ने कहा ‘WhatsApp से नहीं चलेगा काम’

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि आयोग फील्ड स्तर पर औपचारिक सर्कुलर के बजाय व्हाट्सऐप संदेशों के जरिए निर्देश दे रहा है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, ‘सभी निर्देश लिखित और आधिकारिक सर्कुलर के माध्यम से ही जारी होने चाहिए। व्हाट्सऐप से व्यवस्था नहीं चलाई जा सकती।’

तीन श्रेणियों में नोटिस

अदालत को बताया गया कि अब तक लगभग दो करोड़ मतदाताओं को दस्तावेज सत्यापन के नोटिस भेजे गए हैं।

इन्हें मैप्ड, अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

चुनाव आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी को प्रकाशित की जानी है।

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