सेवा, संस्कार व स्नेह की मूर्ति धनेश शुक्ल ने 94 वर्ष में लीं अंतिम सांस,आदित्यपुर में श्रद्धांजलि सभा 16 नवंबर को
जमशेदपुर । कोल्हान में शिक्षा जगत की जानी मानी हस्ती रहे जमशेदपुर कोऑपरेटिव कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर दिवंगत डॉ. रवींद्र दत्त शुक्ल की धर्मपत्नी, समाजसेविका, सनातन धर्म व लोक संस्कृति की वाहक धनेश शुक्ल अपना नश्वर शरीर छोड़कर उस अनंत यात्रा पर निकल चुकी हैं जहां जाने के बाद इस सांसारिक जीवन से किसी तरह का रिश्ता नहीं रहता।इसी 1 नवंबर 2025 की सुबह आदित्यपुर-2 में अपनी बेटी डॉ (प्रो.) किरण के घर में 94 वर्ष 9 महीने की आयु में धनेश शुक्ल ने परिवार के स्नेह और आत्मीय वातावरण में शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली। उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभा 16 नवंबर को आदित्यपुर में आयोजित की गई है।उनके साथ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा युग विदा हो गया — त्याग, धर्मनिष्ठा, सेवा और करुणा का युग। वे उन दुर्लभ आत्माओं में से थीं जिनका जीवन स्वयं में प्रेरणा था।जीवन का प्रारंभ व संघर्ष की नींव21 जनवरी 1931 को कुल्हारिया (बिहार) के एक संस्कारी कुलीन ब्राह्मण परिवार में जन्मी धनेश जी, देव कुमार शर्मा और सुरेश्वरी देवी की सुपुत्री थीं। उन्होंने 1945 तक वहीं अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की।बचपन से ही वे संस्कार, अनुशासन और अध्ययन की प्रति अत्यंत गंभीर थीं। जीवन के शुरुआती वर्षों में ही उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि स्त्री केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज की प्रेरणा भी बन सकती है।घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी उन्होंने सीखने और आत्मविकास की ललक नहीं छोड़ी। उनका स्वभाव शांत, पर दृढ़ था — यही गुण आगे चलकर उन्हें परिवार और समाज में सम्मानित बनाते गए।संगिनी व सहयोगिनी के रूप मेंधनेश जी ने स्वर्गीय डॉ. रवींद्र दत्त शुक्ल से विवाह कर जीवन का नया अध्याय आरंभ किया। डॉ. शुक्ल अविभाजित बिहार के जाने-माने शिक्षाविद थे। , जमशेदपुर कोऑपरेटिव कॉलेज में लंबे समय तक प्रोफेसर रहते हुए उन्होंने हजारों छात्रों का भविष्य संवर था।डॉ शुक्ल समाजसेवी और शिक्षित व्यक्तित्व थे और धनेश जी उनके हर कार्य में मौन शक्ति के रूप में साथ रहीं।वे कहती थीं — पति के साथ केवल सुख में नहीं, हर परिस्थिति में साथ निभाना ही सच्चा धर्म है।एक आदर्श गृहिणी के रूप में उन्होंने परिवार को एक सूत्र में बांधे रखा। सादगी, प्रेम और विनम्रता उनका स्वभाव था। उनका घर रिश्तों की गर्माहट से भरा रहता — कोई भी आए, खाली हाथ नहीं लौटता।परिवार में वे अनुशासन और स्नेह का ऐसा संतुलन रखतीं कि सब उनके प्रति आदर और आत्मीयता दोनों रखते थे।धार्मिक आस्था व सामाजिक सेवा का संगमधनेश शुक्ल केवल धार्मिक नहीं थीं, वे सनातन धर्म की सजीव मिसाल थीं। उनके जीवन में “कर्म ही पूजा है” की भावना स्पष्ट झलकती थी।वे नित्य पूजा-पाठ और ध्यान करतीं, परंतु धर्म को उन्होंने केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे आचरण में उतारा — आत्मसंयम, संयमित जीवनशैली और समाजसेवा उनके जीवन के मूल स्तंभ थे।उन्होंने स्थानीय परिवार कल्याण संस्थाओं से जुड़कर महिलाओं को स्वास्थ्य और जागरूकता के प्रति प्रेरित किया। साथ ही, नज़दीकी अस्पतालों में कैंसर पीड़ितों की सेवा में भी सक्रिय रहीं।उनकी मान्यता थी — धर्म वही है, जो दूसरों के दुख को समझे और उसे कम करने की कोशिश करे।वे जहां जातीं, अपने कर्मों से लोगों के जीवन में आशा की लौ जला जातीं।संस्कृति व संगीत की साधिकाधनेश जी का व्यक्तित्व धार्मिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना से भी परिपूर्ण था। वे भोजपुरी लोकभाषा, कहावतों और परंपराओं की गहरी जानकार थीं।वे एक उत्साही गायिका थीं — परिवार या समाज में कोई आयोजन हो, उनके मधुर स्वर से वातावरण भावनाओं से भर जाता।उनके गीत केवल सुर नहीं, जीवन के अनुभव थे। वे कहा करती थीं — लोकगीतों में हमारी जड़ों की महक है, इन्हें बचाना हमारी जिम्मेदारी है।नई पीढ़ी को उन्होंने हमेशा अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा दी। उनके शब्दों में अनुभव की गहराई और मातृत्व की मिठास थी।पवित्रता व सकारात्मकता की प्रतीकधनेश जी का व्यक्तित्व दृढ़ता और कोमलता का अनोखा संगम था। वे अपने सादे और संतुलित जीवन के लिए जानी जाती थीं।स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के प्रति सजग रहना उनका स्वभाव था। योग, ध्यान और सादा आहार उनके जीवन का हिस्सा थे।वे कहती थीं — जीवन का अर्थ लंबा होना नहीं, बल्कि उपयोगी होना है।वे हर किसी के दुख-सुख में शामिल होतीं, अपनी सकारात्मक सोच से दूसरों को प्रेरित करतीं। उनके चेहरे की मुस्कान और आंखों की शांति उनके भीतर की रोशनी का प्रमाण थी।परिवार — उनकी सबसे बड़ी पूंजीधनेश जी के जीवन का केंद्र उनका परिवार था। पुत्रियाँ —डॉ. (प्रो.)उषा शुक्ल, डॉ. (प्रो.) किरण, पुत्र उदय एवं पुत्रवधू , पोते-पोतियाँ — रवि, नितिन, शशि, प्रियंका, ऐश्वर्या, वैभव — सभी उनके संस्कारों की छाया में पले-बढ़े।उन्होंने बच्चों को सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य भी दिए — सम्मान, अनुशासन और करुणा।उनका घर प्रेम, आदर और आत्मीयता का जीवंत उदाहरण था।आज उनके जाने के बाद भी उनके शब्द, उनकी सीख और उनका स्नेह परिवार के हर सदस्य के हृदय में जीवित है।श्रद्धांजलि सभा सोमवार को उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभा 16 नवंबर को शाम 7:30 बजे 63 एमआईजी कॉलोनी, आदित्यपुर-2 में आयोजित की गई है। उनका श्राद्ध कर्म सोमवार को ही दिन मे होगा।उस दिन केवल परिवार ही नहीं, बल्कि असंख्य मित्र, पड़ोसी और शुभचिंतक भी उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे।अमेरिका के मिशिगन में रहने वाले उनके इकलौते पुत्र उदय शुक्ल अपनी बहनों उषा और किरण समेत परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्यों के मार्गदर्शन में पूरे सनातन विधि विधान के साथ मां के श्राद्ध कर्म अनुष्ठान को, पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ पूरा करने में जुटे हुए हैं।उदय का यह समर्पण भाव दर्शाता है कि यदि बचपन में ही बच्चों को सही संस्कार दिए जाएं तो व आगे चलकर वटवृक्ष का रूप धारण करते हैं और विरासत में मिले संस्कारों को पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ाते हैं।अमर रहेगी उनकी विरासतधनेश शुक्ल का जीवन बताता है कि नारी शक्ति केवल घर तक सीमित नहीं होती — वह समाज, संस्कृति और धर्म की धुरी होती है।उन्होंने अपने कर्मों से सिखाया कि सेवा ही सच्चा धर्म, और प्रेम ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है।उनके जाने से जो शून्य पैदा हुआ है, वह कभी भरेगा नहीं, परंतु उनके संस्कार और उनका स्नेह हर दिल में हमेशा जीवित रहेंगे।जमशेदपुर के आदित्यपुर निवासी जाने-माने सामाजिक वैज्ञानिक और समाजवादी विचारधारा के सनातनी चिंतक रवींद्रनाथ चौबे कहते हैं किधनेश जी चली गईं, पर उनकी सीख, उनका स्नेह और उनकी मुस्कान हर उस दिल में है, जिसे उन्होंने छुआ था। उन्होंने जीवन को इतना उजला बना दिया कि मृत्यु भी उनके आगे नतमस्तक हो गई।
