राष्ट्रीय बालिका दिवस: अवसर है अपनी स्त्रियों की उपलब्धियों को स्मरण करने का, एवं कृत्रिम हीनता के विमर्श को समझने का

सोनाली मिश्रा

आज के दिन भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। इस दिन को इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इस दिन भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी और कहा जाता है इसलिए भी यह दिन मनाया जाता है जिससे बालिकाएं सशक्तिकरण का अनुभव कर सकें।

परन्तु यह भी बात ध्यान देने योग्य है कि भारत में वर्ष १९४७ के उपरान्त प्रथम महिला शासक के रूप में जहाँ इंदिरा गांधी ने शपथ ली थी, तो वहीं भारत में महिला शासकों की एक लम्बी परम्परा रही है। ऐसा नहीं था कि भारत में महिला शासक नहीं थीं, भारत में समय समय पर ऐसी शासक हुई थीं, ऐसी योद्धा हुई थीं, जिन्होनें शत्रुओं को धूल चटाई थी।

हिन्दुओं के धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट वर्णित है कि बालिकाओं के लिए शिक्षा दीक्षा तो अनिवार्य थी ही, साथ ही अस्त्र शस्त्र की शिक्षा भी उन्हें प्रदान की जाती थी। रामायण में कैकई तो महाभारत में सत्यभामा, चित्रांगदा आदि स्त्रियों के वर्णन प्राप्त होते हैं।

उसके उपरान्त भी स्त्रियों की शासन में भूमिका महत्वपूर्ण रही एवं ऐसे अनेकोनेक अवसर आए जब स्त्रियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बालिकाओं को आरम्भ से ही सम्मान दिया जाता रहा है एवं वैदिक काल में ऋषिकाओं ने भी तमाम सूक्त रचकर यह प्रदर्शित किया कि भारत में स्त्रियों की शिक्षा का स्तर क्या था। हिन्दूपोस्ट पर समय-समय पर ऐसी अनेक स्त्रियों के विषय में लेख प्रकाशित होते रहे हैं जिन्होनें शस्त्र एवं शास्त्र दोनों ही क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

आज जब बालिका दिवस मनाया गया, तो आवश्यक था कि भारत में बालिकाओं के मस्तिष्क में विमर्श की वह धारा प्रदान करना जिसमें स्त्री विमर्श के नाम पर विध्वंस नहीं है, परिवार की टूटन नहीं हैं, पुरुषों का विरोध नहीं है एवं सबसे बढ़कर हिन्दू धर्म का विरोध नहीं है।

आज जब बालिका शिक्षा ग्रहण करने जाती है, तो विमर्श के स्तर पर उसके मस्तिष्क को इस सीमा तक दूषित कर दिया जाता है कि वह हिन्दू धर्म के विरोध में खड़ी हो जाती है। कविताएँ ऐसी बनाई जाती हैं जिनमें सीता माता को विवश, द्रौपदी को पीड़ित तथा सावित्री को पिछड़ा प्रदर्शित किया जाता है। वेदों में स्त्रियों द्वारा रचे गए सूक्तों का वर्णन नहीं किया जाता है, तथा जिन भी कथित स्त्रियों का वर्णन उनकी पुस्तकों में होता है जैसे पंडिता रमा बाई, या फिर सावित्री बाई फुले तो यह वर्णन ऐसे होता है जिसमें उनका हिन्दू धर्म ही सबसे बड़ा खलनायक बनकर सामने आता है।

जबकि उसी समय धर्मपाल जी ने स्त्री शिक्षा को लेकर जो आंकड़े प्रस्तुत किए होते हैं, उन्हें छिपा लिया जाता है। उनके कोमल मस्तिष्क में अत्यंत विध्वंसक पद्धति से यह बैठाया जाता है कि मुग़ल काल में एवं उससे पहले स्त्रियों को अध्ययन का अधिकार नहीं था, जबकि इंटरकोर्स बिटवीन इंडिया एंड द वेस्टर्न वर्ल्ड में एच जी रावलिसन, मेगस्थनीज़ द्वारा रची गयी इंडिका के माध्यम से लिखते हैं कि

“यद्यपि उच्चवर्ग में बहुविवाह प्रचलित था, परन्तु महिलाओं को अत्यंत स्वतंत्रता थी। वह दर्शन एवं तत्व ज्ञान का अध्ययन करती थीं”

इसी पुस्तक में वह आगे लिखते हैं कि महिलाओं की बुरी स्थिति मुगलों के काल से आरम्भ हुई।

ऐसे एक नहीं अनगिनत उदाहरण हैं, जिनमें महिलाओं की स्वतंत्र स्थिति के विषय में बताया गया है। यहाँ तक कि चाणक्य भी अर्थशास्त्र में महिला श्रमिकों आदि का उल्लेख करते हुए स्त्रियों के अधिकारों एवं स्त्रियों के पुनर्विवाह तक की बात करते हैं।

यह तमाम उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत में प्राचीन काल से ही स्त्रियों का विशेष स्थान रहा, स्त्रियों के पास अधिकार रहे एवं उनके पास शिक्षा से लेकर युद्ध क्षेत्र तक की उपलब्धियां थीं। परन्तु जब पाठ्यक्रम की बात आती है या साहित्य की बात आती है तो स्त्री की ऐसी छवि बालिकाओं के सम्मुख प्रस्तुत की जाती है, जिसमें स्त्री शताब्दियों से दबी कुचली  है। उसके हिस्से कोई अधिकार नहीं थे, उसके हिस्से मात्र उत्तरदायित्व थे एवं उसके नैनों में मात्र अश्रुओं का ही संसार था।

इन अश्रुओं में धुल कर बह जाती हैं उन तमाम वीरांगनाओं की वीरगाथाएं एवं बलिदान, खो जाती हैं, कोटा रानी, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, रानी अहल्याबाई, रानी जीजाबाई, ताराबाई। रानी लक्ष्मीबाई, अवंतिबाई लोधी, झलकारी बाई जैसी असंख्य स्त्रियों की वीरता की कहानियां!

इन अश्रुओं में खो जाती हैं मीराबाई, कुंवरिबाई, सहजोबाई की रचनाएं और इन अश्रुओं में खो जाता है वैद्य यशोदा देवी का विमर्श, इन अश्रुओं में खो जाता है सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाएं!

इन अश्रुओं में खो जाती है वह तमाम असंख्य स्त्रियाँ जिन्होनें अपनी शिक्षा के प्रयोग से अपनी हर पीढी के लिए चेतना का स्वर दिया। जिन्होने धर्म एवं देश की रक्षा के लिए लड़ने वाले योद्धाओं में वह मूल्य प्रदान किए जिन्होनें विधर्मी मुगलों से निरंतर लोहा लिया एवं धर्म की चेतना को जागृत बनाए रखा।

कृत्रिम विमर्श के अश्रु जब हमारी बालिकाओं को कथित आजादी के विमर्श में लपेट कर दिए जाते हैं तो उसके हृदय में अपने धर्म, अपने पुरुषों एवं अपने मूल्यों के प्रति एक ऐसा कृत्रिम द्वेष उत्पन्न होता है, जो कहीं से भी न ही उसके व्यक्तित्व और न ही देश, धर्म और समाज के लिए उपयोगी होता है! यह कृत्रिम आत्मदया का विमर्श हमारी बेटियों के व्यक्तित्व को कहीं न कहीं खंडित करता है अत: आवश्यक है कि बेटियों के लिए विमर्श धार्मिक चेतना से संपन्न स्त्रियों का उत्पन्न किया जाए!

(यह स्टोरी हिंदू पोस्ट की है और यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित की जा रही है.)

(यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों, दृष्टिकोणों और तर्कों को व्यक्त करता है। कॉलम और लेखों में व्यक्त किये गये विचार किसी भी तरह से टाउन पोस्ट, इसके संपादक की राय या इसकी संपादकीय नीतियों या दृष्टिकोण को इंगित नहीं करते हैं.)

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