यूजीसी गाइडलाइन्स पर बरसे सरयू राय, बताया ‘नख-दंत विहीन’ व ‘भ्रामक’, वापस लेने की उठाई मांग

​जमशेदपुर। उच्च शिक्षा में समानता लाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी हालिया विनियमन विवादों के घेरे में आ गया है। झारखंड के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री सरयू राय ने इन नियमों को पूरी तरह से दिशाहीन और त्रुटिपूर्ण करार दिया है।

जमशेदपुर पश्चिम से ज दयू विधायक के रूप में एनडीए गठबंधन में शामिल होने के बावजूद सरयू राय राज्य के पहले ऐसे नेता बन गए हैं, जिन्होंने इस संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दे पर खुलकर अपना विरोध दर्ज कराया है।

​”प्रस्तावना कुछ और, प्रावधान कुछ और”

​विधायक सरयू राय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर अपनी राय साझा करते हुए यूजीसी के ड्राफ्ट पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि इन विनियमों की प्रस्तावना (Preamble) में तो ‘समानता के संवर्द्धन’ की बात कही गई है, लेकिन इसके भीतर के प्रावधान ठीक इसके विपरीत हैं। राय के अनुसार, यह पूरी गाइडलाइन ‘नख-दंत विहीन’ (शक्तिहीन) है और इसमें उद्देश्यों एवं प्रावधानों के बीच कोई तालमेल नहीं है।

​सरयू राय द्वारा उठाए गए प्रमुख सवाल:

​अनावश्यक भ्रम: यह नियम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में स्पष्टता लाने के बजाय भ्रम पैदा करने वाले हैं।

​हड़बड़ी में तैयार: विधायक ने आरोप लगाया कि यूजीसी ने बिना व्यापक विमर्श और जमीनी हकीकत को समझे इसे बेहद हड़बड़ी में तैयार किया है।

​असमानता को बढ़ावा: समानता लाने का दावा करने वाला यह विनियमन वास्तव में शैक्षणिक संस्थानों के बीच की खाई और असमानता को और ज्यादा बढ़ा देगा।

​झारखंड के एकमात्र नेता जिन्होंने लिया स्टैंड

​इस चर्चित मुद्दे पर जहां राज्य के अन्य बड़े राजनीतिक दल और नेता फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं सरयू राय ने अपना स्टैंड सार्वजनिक कर सियासी हलचल तेज कर दी है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि बेहतर होगा कि यूजीसी इन नियमों को तत्काल प्रभाव से वापस ले ले, क्योंकि यह उच्च शिक्षा के ढांचे को सुधारने के बजाय और बिगाड़ सकते हैं।

​सियासी मायने व शिक्षा जगत की चिंता

​यूजीसी के इन नए नियमों को लेकर देशभर के शैक्षणिक हलकों में बहस छिड़ी हुई है। सरयू राय जैसे अनुभवी नेता के विरोध ने केंद्र सरकार और यूजीसी की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। जानकारों का मानना है कि सरयू राय का यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसमें नीतिगत विसंगतियों को लेकर एक गहरी चिंता छिपी है।

​निष्कर्ष: क्या पीछे हटेगा यूजीसी?

​अब गेंद यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय के पाले में है। सरयू राय की मांग के बाद क्या झारखंड के अन्य नेता भी इस विरोध में शामिल होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, उच्च शिक्षा के भविष्य को लेकर छिड़ी यह जंग अब विधानसभा से लेकर सोशल मीडिया तक पहुंच गई है।

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